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Saturday, October 12, 2024

लड़कियो ! हँसो

लड़कियो, सुनो
हँसो
हँसती रहो इसी तरह
तुम्हारे हँसने से होगी दुनिया रौशन
 
तनी मुट्ठियों का जवाब —
तुम्हारी हँसी
पूर्वजाओं के आंसुओं का प्रतिकार —
तुम्हारी हँसी
हम कायरों की कविता का मखौल — 
तुम्हारी हँसी ।

–– सुनील श्रीवास्तव

Thursday, October 10, 2024

गुलामी

 

 




 

मनुष्य के कल्याण के लिए

पहले उसे इतना भूखा रखो कि वह औऱ कुछ

सोच न पाए

फिर उसे कहो कि तुम्हारी पहली जरूरत रोटी है

जिसके लिए वह गुलाम होना भी मंजूर करेगा

फिर तो उसे यह बताना रह जाएगा कि

अपनों की गुलामी विदेशियों की गुलामी से बेहतर है

और विदेशियों की गुलामी वे अपने करते हों

जिनकी गुलामी तुम करते हो तो वह भी क्या बुरी है

तुम्हें रोटी तो मिल रही है एक जून ।

 –– रघुवीर सहाय

Monday, October 7, 2024

हँसती हुई लड़कियाँ

 


हँसती हुई लड़कियाँ

कितनी अच्छी लगती हैं!

 

जैसे सारे गम को भुलाकर

दुनिया को कह रही हों

जिन्दगी बहुत कठिन है

लेकिन है बहुत सुन्दर

इसलिए एक बार अपने गम भुलाकर

हँसो हमारे साथ ।

 

संघर्षों से रहित जिन्दगी

नहीं चाहिए हमें

इस दुखभरी, कठिन जिन्दगी को

हँसती हुई लड़कियों की तरह खूबसूरत बनाना होगा

जिसमें सभी हँस सके

खिल खिलाकर

लड़कियों की तरह ।

 

सबको निश्छल होकर

हँसना सीखना होगा

खिल खिलाकर

हँसती हुई लड़कियों की तरह ।

 

जितनी दुनिया पुरुषों की है

उतनी दुनिया लड़कियों की भी है

अपने हक के लिए

संघर्ष में लगी लड़कियाँ

निश्छल और मन की बहुत साफ होती हैं

उन्हें कुछ नहीं चाहिए

बस थोड़ा प्यार माँगती हैं लड़कियाँ

इसलिए थोड़े में खुश हो जाती हैं

और खिल खिलाकर

हँस देती हैं प्यारी लड़कियाँ ।

–– सुनीता शर्मा

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Wednesday, October 2, 2024

बईमान प्रार्थनाएँ


 अषाढ़ के महीने में

ये पक्के रंग वाली मेहनतकश औरतें

मय परिवार उजाड़ आयीं हैं

अपना डेरा–डंडा

 

बूढ़–पुरनियाँ, बच्चा–बुतरू सब लेकर

घर झारकर उठ आयीं हैं

बहुत दूर

 

मंदिर के पीछे

और मंदिर से दूर

 

तालाब के किनारे

और तालाब से दूर

 

निखहरे लेटी हुई हैं इनकी बुढियाएँ

आसमान ताकते हुए

जिनकी आँखों के लिए इस उम्र में भी

दिन में देखा गया सपना ही है

दो मुट्ठी भात

 

सांप बिच्छू के दिन में

घास पर नंगे ही सोए हुए हैं

उनकी गोद के बच्चे

 

जिनकी सांसें उनकी पसलियों के बीच

अटक–अटक कर चल रही है

यह देखने के लिए

नहीं चाहिए किसी डॉक्टर की नजर

 

खड़ी दोपहर में

बाल–बच्चों को छोड़

घुटने भर कीचड़ में कछोटा मारकर

उतर जाती हैं

 

बाढ़ उतर जाने के बाद

कमर तोड़कर रोपती हैं धान

 

खुली भूख लिए

आधा पेट खाती हैं

गीत गाती हैं

 

और घोंघे और जोंक के दिए घावों को

गिने बिना ही

सो जाती हैं खुले आसमान के नीचे

बदले में

 

उनके आँचलों में पलट दिया जाता है

सूंड़ी, सुरसुरियों और मूस की लेडियों से भरा हुआ अनाज

गाय–भैंसों ने फेर लिए हैं जिनसे मुँह

 

भादो तक खुले आसमान के नीचे

अपने प्रवास के बाद

लौट जाती हैं अपने देस

 

उनके हाथों में छोटी–छोटी पोटलियाँ हैं

जिनमें एक भी पोटली

कृतज्ञता की नहीं

 

फसल लहलहा जाती है

जोत मालिक

आसमान की तरफ उठाता है हाथ

और उस ईश्वर को देता है धन्यवाद

जिसके पसीने की एक बूंद तक नहीं टपकी है

उसके खेत में

 

अपनी प्रार्थना में अर्पित कर देता है

रोपनिहारिनों के हिस्से की सब कृतज्ञताएँ

 

और मैं सोचती हूँ कि

इन पेट–कटवा बईमानों का

कौन सा बईमान ईश्वर है!

जो स्वीकार करता है बईमान प्रार्थनाएँ

और हड़प जाता है मेहनतकशों का हिस्सा

बिना हिचके और बिन सवाल किए!!

–– कविता कादम्बरी

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Tuesday, October 1, 2024

मैंने तोड़ी से सदियों से सीखी चुप्पी

 

मैं आजाद होना चाहती हूँ

इसका अर्थ यह तो नहीं,

मैं तुमसे मुक्त होना चाहती हूँ

न ही आजाद होने का अर्थ है

तुम्हारे प्यार से मुक्त होना

मैं तो बस

प्यार करने की हकदार होना चाहती हूँ

खुद प्यार करना चाहती हूँ

 

मैंने कब नकारे हैं रिश्ते ?

कब तोड़े हैं नेह के धागे ?

मैंने तो तोड़ी से सदियों से सीखी चुप्पी

पूछा है गार्गी का सवाल, माँगा है तर्क का जवाब

इसका यह अर्थ तो नहीं तुम दे दो मुझे शाप

कि भंग हो गया है आस्था का कौमार्य

कि टूट गया है विश्वास का पुंसत्व

 

रिश्ता कहीं बेड़ी न बन जाय

मैं तो बस

बाखबर होशियार रहना चाहती हूँ

शापों की श्रृंखला का बहिष्कार करना चाहती हूँ!

–– रमणिका गुप्ता

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Friday, September 13, 2024

कमाल की औरतें










 

(1)

देर तक औरतें अपने साड़ी के पल्लू में

साबुन लगाती रहती हैं

कि पोंछ लिए थे भीगे हाथ

हल्दी के दाग...अचार की खटास या थाली की गर्द

या झाड़ लिया था नमक

पोंछ लिया था छुटके ने अपना मटियाला हाथ


साथ इसके ये भी कि गठियाकर रखा था

जमाने भर का दर्द

सर्द बिस्तर पर निचुडने के बाद का माथा पोंछा था शायद

बाद मंदिर की आरती की थाली भी

बेचैनियों पर आँख का पानी भी


जमाने भर के दाग धब्बे को

एक पूरा दिन खोंसे रही

अपनी कमर के गिर्द

अब देर तक अपना पल्लू साफ करेंगी औरतें

कि पति के मोहक क्षणों में

मोहिनी–सी, नीले अम्बर–सी तन जायेंगी

ये कपड़े को देर तक धोती नजर आयेंगी

मुश्किल के पाँच दिनों से ज्यादा मैले कपड़े

जमाने का दाग


ये अपनी हवाई चप्पलों को भी धोती हैं देर तक

घर की चहारदीवारी के बाहर पैर ना रखने वाली

घूमती रहती हैं...अपनी काल्पनिक यात्राओं में दूरदराज

ये जब भाग–भाग कर निपटाती हैं अपने काम

ये नाप आती हैं समन्दर की गहराई

देख आती हैं नीली नदी...चढ़ आती हैं ऊँचे पहाड़

मायके की उस खाट पर

अपने पिता के माथे को सहला आती हैं

जो जाने कब से बीमार है

इनकी चप्पलें हजार–हजार यात्राओं से मैली हैं

ये देर तक ब्रश से मैल निकालती पायी जाती हैं


ये देर तक धोती रहती हैं मुँह की आग

भाप को मिले घड़ी भर आराम

ये चूडियों में फँसी कलाइयों को निकाल बाहर करती हैं

जब धोती हैं हाथ

ये लाल होंठों को रगड़ देती है

सफेद रूमाल में उतार देती हैं तुम्हारी जूठन

ये चैखट के बाहर जाने के रास्ते तलाशती हैं

पर रुकी रह जाती हैं...अपने बच्चों के लिए


ये देर तक धोती हैं

अपने सपने...अपने ख्याल...अपनी उमंगें

इतनी कि सफेद पड़ जाए रंग

ये असली रंग की औरतें

नकली चेहरे के पीछे छुपा लेती हैं तुम्हारी असलियत

ये औरतें

अपनी आत्मा पर लगी तमाम खरोंचों को भी छुपा ले जाती हैं

और तुम कहते हो...

कमाल की औरतें हैं...

इतनी देर तक नहाती हैं!

 

(2)

ये तहों में रखती हैं अपनी कहानियाँ

कभी झटक देती हैं धूप की ओर

अपने बिखरे सपनों को बुहार देती हैं


ये बार–बार मलती हैं आँखें

जब सहती हैं आग की दाह

ये चिमटे के बीच पकड़ सकती हैं

धरती की गोलाई

धरती काँपती है थर–थर


ये फूल तोड़ती हुई मायूस होती हैं

पूजा करती हुई दिखाती हैं तेजी

बड़बड़ाती हैं दुर्गा चालीसा

ठीक उसी समय ये सीधी करती हैं सलवटें

पति की झक्क सफेद कमीज की


इनकी पूजा के साथ

निपटाये गये होते हैं खूब सारे काम

ये नमक का ख्याल बराबर रखती हैं

बच्चों के बैग में रखती हैं ड्राइंग की कॉपी

तो बड़ी हसरत से छू लेती हैं उसमें

बने मोर के पंखों को

ये छोटे बेटे के पीछे पंख–सी भागती हैं

कि छूटती है बस स्कूल की

‘तुम हमेशा टिफिन बनाने में देर कर देती हो मम्मा’

इनके हाथों में लगा नमक

इनकी आँखों में पड़ जाता है


ये बार–बार ठीक करती हैं

घड़ी का अलार्म

ये आधी चादर ओढ़ कर सोयी औरतें

पूरी रात बेचैन कसमसाती हैं सांस रोके

इनकी हथेलियों में पिसती है एक सुबह

आँखों में लडखड़ाती है एक रात


ये उठती हैं तो दीवार से टिक जाती हैं

सम्भलती हैं, चलती हैं, पहुँचती हैं गैस तक

खटाक की आवाज के साथ

जल जाती हैं


और तुम कहते हो–

कमाल की औरतें हैं...

चाय बनाने में इतनी देर लगाती हैं!

–– शैलजा पाठक

Wednesday, December 6, 2023

मेरा देश नग्नता का आदी है...

 

मेरा देश नग्नता का आदी है
सुना है,
यहाँ जुए में भेंट चढ़ी द्रौपदी को नग्न कर
वहशी सत्ता हँसते–हँसते लोट–पोट हो गयी थी
 
इतिहास गवाह है
यहाँ जमीन के टुकड़े से लेकर
जागीर लूटने तक का जश्न
औरतों की अस्मिता को लूटकर मनाया जाता रहा है
 
यहाँ शरीर से लेकर
सम्पत्ति की ताकतों का प्रदर्शन करने के लिए
परिवार की इज्जत धूमिल करने के लिए
भाई की नाक काटने
और पिता की पगड़ी उछालने के लिए
केवल स्त्री ही नहीं
बल्कि पुरुषों का अहंकार तोड़ने के लिए भी
मात्र स्त्री की आबरू उतार फेंकना
पर्याप्त माना गया है
 
यहाँ बड़े–बड़े युद्धों की शुरुआत
और उनकी समाप्ति
औरतों को निर्वस्त्र कर
उनकी नंगी लाश को नोंचकर होती रही है
 
यहाँ जंगल बचाने निकलीं
आदिवासी और पहाड़ी औरतें
लूट की संस्कृति द्वारा इस कदर नग्न की गयी
कि कभी वापिस नहीं लौट सकीं
 
यहाँ पत्थरों को
कपड़ों और आभूषणों से सजाया गया
और जिन्दा इनसानों को
डराने–धमकाने
दबाने–झुकाने
और खामोश करने के लिए
समय–समय पर नंगा दौड़ाने की बात होती रही है
 
इस देश में सदियों से नजरें और नीयत
लूट और वहशियत की गिरफ्त में रही हैं
इसलिए यह देश अब नंगेपन का आदी हो चुका है
 
लेकिन इतनी सारी नग्नताओं के बावजूद भी
इस देश को नागवार हैं,
नंगी तलवार–सी वे औरतें
जो चैराहे पर खड़ी होकर दहाड़ रही हैं
जो डरपोक और दब्बू नहीं हैं।
–– मेघा, रामनगर

Friday, January 24, 2020

बंटवारा

दुनिया में अलग-अलग बस्तियां बसाई जाएं
हर जात ,धर्म,रंग, नस्ल, भाषा के 
अलग-अलग राज्य बनाए जाएं,
जब पुरुषों द्वारा ठीक से पूरा बंटवारा हो जाए
स्त्रियों का एक अलग ,
चाहे छोटा ही सही
नया द्वीप बसाया जाये...
वह दुनिया होगी महिलाओं के कपड़ों जैसी रंग बिरंगी
गर्भवति महिलाओं के कोख से जन्मे नए बच्चे 
बसाएंगे जहां नई धरती..
जहां न होंगे बलात्कार ,वेश्यावृति 
और विश्व युद्ध की तैयारी
जहां दिलों के बीच नहीं होगा 
किसी भी तरह का बंटवारा..
नहीं होंगे जहां घृणित अपराध
जहां गैर बराबरी के लिए नहीं होगी कोई जगह
जहां बटवारा होगा हर एक चीज/सामान का 
जरुरत के मुताबिक
जैसे आज भी मां करती है घरों के अंदर...
इस तरह दुनिया में कायम हो जाएगी शांति
और पूरा हो जाएगा पुरुषों का अहंकार भी।।
-स्वाति

Sunday, September 22, 2019

रॉक डाल्टन की कविता — बेहतर प्यार के लिए


रॉक डाल्टन (1935-1975) अल साल्वाडोर के क्रांतिकारी कवि रॉक डाल्टन ने अपनी छोटी सी जिंदगी कला और क्रांति के सिद्धांत को आत्मसात करने और उसे ज़मीन पर उतारने मे बिताई. उनका पूरा जीवन जलावतनी, गिरफ्तारी, यातना, छापामार लड़ाई और इन सब के साथ-साथ लेखन में बीता. उनकी त्रासद मौत अल साल्वाडोर के ही एक प्रतिद्वंद्वी छापामार समूह के हाथों हुई. उनकी पंक्ति- “कविता, रोटी की तरह सबके लिए है” लातिन अमरीका मे काफ़ी लोकप्रिय है. यह कविता मन्थली रिव्यू, दिसंबर 1985 में प्रकाशित हुई थी.)



हर कोई मानता है कि लिंग
एक श्रेणी विभाजन है प्रेमियों की दुनिया में-
इसी से फूटती हैं शाखाएँ कोमलता और क्रूरता की.

हर कोई मानता है कि लिंग
एक आर्थिक श्रेणी विभाजन है-
उदाहरण के लिए आप वेश्यावृत्ति को ही लें,
या फैशन को,
या अख़बार के परिशिष्ट को
जो पुरुष के लिए अलग है, औरत के लिए अलग.

मुसीबत तो तब शुरू होती है
जब कोई औरत कहती है
कि लिंग एक राजानीती श्रेणी विभाजन है.

क्योंकि ज्यों ही कोई औरत कहती है
की लिंग एक राजनीतिक श्रेणी विभाजन है
तो वह जैसी है, वैसी औरत होने पर लगा सकती है विराम
और अपने आप की खातिर एक औरत होने की कर सकती है शुरुआत,
औरत को एक ऐसी औरत मे ढालने की
जिसका आधार उसके भीतर की मानवता हो
उसका लिंग नहीं.

वह जान सकती है कि नीबू की महक वाला जादुई इत्र
और उसकी त्वचा को कामनीयता से सहलाने वाला साबुन
वही कंपनी बनाती है, जहाँ बनता है नापाम बम,
कि घर के सभी ज़रूरी काम
परिवार के एक ही सामाजिक समुदाय की ज़िम्मेदारी हैं,
की लिंग की भिन्नता
प्रणय के अंतरंग क्षणों मे तभी परवान चढ़ती है
जब परदा उठ जाता है उन सारे रहस्यों से
जो मजबूर करते हैं मुखौटा पहनने पर और पैदा करते हैं आपसी मनमुटाव.


(अनुवाद- दिगम्बर)

Saturday, September 21, 2019

पढ़ती हुई लड़कियां


सबसे खतरनाक होती हैं
पढ़ती हुई लड़कियां
संगीनों से नहीं डरती हैं
सैनिकों से नहीं डरती हैं
बाग़ी होती हैं
पढ़ती हुई लड़कियां

समाज से नहीं डरती
देह की देहरी
और घर की मुंडेर तक नहीं टिकती
नियम, कायदे और वर्जनाएं लांघ जाती हैं
पढ़ती हुई लड़कियां

अकेले कहां कहां न दनदनाती हैं
उनसे ज़्यादा दनदनाते हैं उनके विचार
दनादन सवाल करती हैं
सरापा सवाल होती हैं
पढ़ती हुई लड़कियां
पढ़ती हुई लड़कियां खतरनाक होती हैं!

- शाहिद अख़्तर


Thursday, September 12, 2019

मैं हैरान हूँ


 — महादेवी वर्मा,
(इतिहास में छिपाई गई एक कविता) 

'' मैं हैरान हूं यह सोचकर , 
किसी औरत ने क्यों नहीं उठाई उंगली ?  
तुलसी दास पर ,जिसने कहा , 
"ढोल ,गंवार ,शूद्र, पशु, नारी,
ये सब ताड़न के अधिकारी।"

मैं हैरान हूं , 
किसी औरत ने
क्यों नहीं जलाई "मनुस्मृति"
जिसने पहनाई उन्हें
गुलामी की बेड़ियां ? 

मैं हैरान हूं , 
किसी औरत ने क्यों नहीं   धिक्कारा ?  
उस "राम" को
जिसने गर्भवती पत्नी सीता को , 
परीक्षा के बाद भी
निकाल दिया घर से बाहर
धक्के मार कर।

किसी औरत ने लानत नहीं भेजी
उन सब को, जिन्होंने
" औरत को समझ कर वस्तु"
लगा दिया था दाव पर
होता रहा "नपुंसक" योद्धाओं के बीच
समूची औरत जाति का चीरहरण ? 
महाभारत में ? 

मै हैरान हूं यह सोचकर , 
किसी औरत ने क्यों नहीं किया ? 
संयोगिता अंबा -अंबालिका के
दिन दहाड़े, अपहरण का विरोध
आज तक !

और मैं हैरान हूं , 
इतना कुछ होने के बाद भी
क्यों अपना "श्रद्धेय" मानकर
पूजती हैं मेरी मां - बहने
उन्हें देवता - भगवान मानकर? 

मैं हैरान हूं, 
उनकी चुप्पी देखकर
इसे उनकी सहनशीलता कहूं या
अंध श्रद्धा , या फिर
मानसिक गुलामी की पराकाष्ठा ?'' 

{महादेवी वर्मा जी की यह कविता, किसी भी पाठ्य पुस्तक में नहीं रखी गई है,क्यों कि यह भारतीय  संस्कृति पर गहरी चोट करती है ?}

Sunday, September 1, 2019

स्त्री “तीन कविताये”


स्त्री “तीन कविताये”
.
१. 
नदिया रोती है 
पत्थरो की ओट में 
मैपलो के बीच कही 
कोई पतझड़ रोता है ......
एक स्त्री रोती है 
परदेश गये 
बेटे और पति के लिये,
भूखे बच्चो के लिये,
स्त्री के आंसू भी 
उसके अपने नही होते .



२
स्त्री 
आकाशगंगा की तरह
समेट लेती है 
ग्रह नक्षत्रो को
अपने आँचल में
और  पृथ्वी की तरह 
हमारी परिक्रमा करती हैं ....
वह प्रेम करती है 
पूरी निश्छलता से
पूरे समर्पण से 
जैसे लहरे करती है
चंद्रमा से प्रेम ....


३.
.
स्त्री रोती है
तो बनते है लोकगीत
हँसती है 
तो बनते है शगुन आखर
विद्रोह करती है स्त्री 
तो इतिहास बनते हैं 
सीपियों के मोती है 
स्त्रियों के रहस्य 
और जीवन 
स्त्री का चेहरा है


Poet of mountains

Saturday, August 31, 2019

रोटी और गुलाब – जेम्स ओपनहाइम


जब हम मार्च करती हुई आती हैं,

मार्च करती हुई, दिन के सौन्दर्य में

दस लाख अँधेरी रसोइयाँ, हजार धूसर मिलें

उजाले से जगमगा जाती हैं,

मानो अचानक सूरज निकल आया हो

लोग हमें अपने लिए गाते सुनते हैं--

“रोटी और गुलाब! रोटी और गुलाब!”

 

जब हम मार्च करती हुई आती हैं,

मार्च करती हुई, हम पुरुषों के लिए भी लड़ती हैं

क्योंकि वे उन महिलाओं के बच्चे हैं

जिनका ऋण उतारना है

जन्म से मृत्यु तक

हमारा जीवन पसीने से तर होकर बर्बाद नहीं होगा

जिस्म की तरह दिल भी भूख से मर रहा है

हम रोटी चाहते हैं, और गुलाब भी

 

जब हम मार्च करती हुई आती हैं,

मार्च करती हुई, अनगिनत औरतें मर गयीं

रोटी के लिए उनकी उस चाह की खातिर

हम गाकर रोती हुई मार्च करती हैं

उनकी परिश्रमी आत्माएँ जानती थीं

छोटी-छोटी कला, प्रेम और सौंदर्य को

हाँ, रोटी ही है जिसके लिए हम लड़ती हैं

लेकिन हम गुलाब के लिए भी लड़ती हैं

 

जब हम मार्च करती हुई आती हैं,

मार्च करती हुई, हम महान दिनों को लाती हैं

महिलाओं का उठ खडा होना,

पूरी इंसानियत का अंगडाई लेना है

वैसी बेगारी और निकम्मापन अब और नहीं

जहाँ दस लोग खटते हैं और एक मजा लूटता है

जीवन की गरिमा वाले महान दिनों के लिए

रोटी और गुलाब! रोटी और गुलाब!

 

1911 में जेम्स ओपेनहाइम की यह कविता अमेरिकी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। यह कविता महिला अधिकारों के लिए चलाए गये आन्दोलन की याद दिलाती है। 1912 में लॉरेंस टेक्सटाइल मिल की हड़ताल के दौरान, वेतन में कमी के विरोध में मिल की महिला कार्यकर्ताओं ने इस कविता को अपने बैनर पर अंकित कर दिया था, "हम रोटी चाहते हैं, और गुलाब भी"।

 

अनुवाद – विक्रम प्रताप 

Tuesday, March 5, 2019

भागी हुई लड़कियां

एक  

घर की जंजीरें 
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं 
जब घर से कोई लड़की भागती है 

क्या उस रात की याद आ रही है 
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी 
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी? 
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट 
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी? 

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के 
आज अपने ही घर में सच निकले! 

क्या तुम यह सोचते थे 
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए 
रचे गए? 
और वह खतरनाक अभिनय 
लैला के ध्वंस का 
जो मंच से अटूट उठता हुआ 
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था? 

दो 

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं 
कभी वह खत 
जिसे भागने से पहले 
वह अपनी मेज पर रख गई 
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से 
उसका संवाद 
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा 
उसका आबनूस 
उसकी सात पालों वाली नाव 
लेकिन कैसे चुराओगे 
एक भागी हुई लड़की की उम्र 
जो अभी काफी बची हो सकती है 
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में? 

उसकी बची-खुची चीजों को 
जला डालोगे? 
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे? 

जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से 
बहुत अधिक 
सन्तूर की तरह 
केश में 

तीन 


उसे मिटाओगे 
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे 
उसके ही घर की हवा से 
उसे वहां से भी मिटाओगे 
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर 
वहां से भी 
मैं जानता हूं 
कुलीनता की हिंसा ! 

लेकिन उसके भागने की बात 
याद से नहीं जाएगी 
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह 

वह कोई पहली लड़की नहीं है 
जो भागी है 
और न वह अन्तिम लड़की होगी 
अभी और भी लड़के होंगे 
और भी लड़कियां होंगी 
जो भागेंगे मार्च के महीने में 


लड़की भागती है 
जैसे फूलों गुम होती हुई 
तारों में गुम होती हुई 
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई 
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में 

चार 

अगर एक लड़की भागती है 
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है 
कि कोई लड़का भी भागा होगा 

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं 
जिनके साथ वह जा सकती है 
कुछ भी कर सकती है 
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है 


तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत 
घर से बाहर 
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं 
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा 
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो 

वह कहीं भी हो सकती है 
गिर सकती है 
बिखर सकती है 
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में 
गलतियां भी खुद ही करेगी 
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक 
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी 
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी 

पांच 


लड़की भागती है 
जैसे सफेद घोड़े पर सवार 
लालच और जुए के आरपार 
जर्जर दूल्हों से 
कितनी धूल उठती है 

तुम 
जो 
पत्नियों को अलग रखते हो 
वेश्याओं से 
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो 
पत्नियों से 
कितना आतंकित होते हो 
जब स्त्री बेखौफ भटकती है 
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व 
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों 
और प्रमिकाओं में ! 


अब तो वह कहीं भी हो सकती है 
उन आगामी देशों में 
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा 

छह 

कितनी-कितनी लड़कियां 
भागती हैं मन ही मन 
अपने रतजगे अपनी डायरी में 
सचमुच की भागी लड़कियों से 
उनकी आबादी बहुत बड़ी है 

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी? 

क्या तुम्हारी रातों में 
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं? 

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया? 
क्या तुम उसे उठा लाए 
अपनी हैसियत अपनी ताकत से? 
तुम उठा लाए एक ही बार में 
एक स्त्री की तमाम रातें 
उसके निधन के बाद की भी रातें ! 

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी 
किसी स्त्री के सीने से लगकर 


सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने 
सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में 
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे 

सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
और दुनिया जब तक रहेगी 
सिर्फ आज की रात भी रहेगी


-आलोक धन्वा