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Saturday, May 1, 2021

विज्ञान विषयों में महिलाओं की भागीदारी




आज के युग में जब औरत अपनी पहुँच, अपनी दस्तक हर क्षेत्र में दे रही है, वह वैज्ञानिक, उद्योगपति, राजनेता, तकनीशियन, सभी जगह अपनी भागीदारी दे रही है, तब भी समाज में महिलाओं के लिए कुछ चुनिन्दा पेशे हैं, जैसे शिक्षिका, नर्स, डॉक्टर या अन्य सेवा भाव वाले काम। आज भी औरतों को मानवीय विषयों जैसे सौंदर्यशास्त्र, कला, संगीत, आदि विषयों के लिए जितना योग्य माना जाता है, उतना वैज्ञानिक या तकनीकी क्षेत्र के लिए नहीं। इससे अलग शिक्षा के लगातार महँगे होते जाने से भी अब विज्ञान या तकनीकी विषयों में महिलाओं की संख्या बढ़ नहीं रही है, क्योंकि शिक्षा के महँगे हो जाने से लड़का या लड़की में से परिवार सिर्फ एक को ही पढ़ा सके तो प्राथमिकता में लड़का ही होता है।
जो थोड़ी बहुत महिलाएँ विज्ञान या गणित विषयों की पढ़ाई करती भी हैं उनमें से बहुत ही कम महिलाएँ विज्ञान या तकनीकी से जुड़े शोध कार्यों में अपनी हिस्सेदारी कर पाती हैं। एक शोध के अनुसार दुनिया भर में वैज्ञानिक शोध कार्यों में लगे शोधार्थियों में केवल 30: महिलाएँ हैं जबकि भारत के मामले में यह आंकड़ा और भी नीचे है। जहाँ 2–8 लाख शोधार्थियों में महिलाओं का प्रतिशत केवल 14: है। इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि शोध संस्थानों में लैंगिक असमानता कितनी ज्यादा होती है जिसका असर हम आज के वैज्ञानिक शोध में महिलाओं से सम्बन्धित विषयों का बहुत कम शोध होने के रूप में देख सकते हैं (महिलाओं को होने वाली बीमारियों पर सबसे कम शोध होते हैं)। महिलाएँ, महिला सम्बन्धी विषयों की जरूरत को बेहतर समझ सकती हैं, इससे अलग महिलाओं से सम्बन्धित विषयों पर ही नहीं बल्कि और दूसरे विषयों में भी महिलाओं की भागीदारी उससे ज्यादा बेहतर बना सकती हैं। माना जाता है कि शोधकर्ताओं के जिस समूह में महिला और पुरुष दोनों होते हैं उनके प्रयोगों के परिमाण उस समूह से ज्यादा बेहतर थे जिसमें सिर्फ पुरुष ही शोधार्थी थे। कुछ शोध से पता चलता है कि महिलाएँ विज्ञान के प्रति पुरुषों से एकदम भिन्न रवैया रखती हैं, जिससे पूरे समूह  के सोचने का दायरा बढ़ जाता है। विज्ञान से जुड़े क्षेत्र में शिक्षा व रोजगार के लिए महिलाओं व लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से  ‘विज्ञान में महिलाओं व लड़कियों के अंतरराष्ट्रीय दिवस’ पर प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
महिलाएँ शोध कार्यों में नहीं जातीं, इसके पीछे समाज में महिलाओं की घरेलू जिम्मेदारियों को निभाना, मातृत्व और बच्चों के पालन–पोषण, बुजुर्गों का ध्यान रखने जैसी सामाजिक जिम्मेदारीयाँ हैं, जिन्हें मुख्यता महिलाएँ ही निभाती हैं। भारत जैसे देश में तो जैसे ये कार्य सिर्फ महिलाओं के ही होते हैं। महिलाएँ कोई भी पेशा करती हों लेकिन उनकी पहली भूमिका माँ, बहन, बेटी, बहू से जुड़ी होती है। महिलाएँ जहाँ इन जिम्मेदारियों को निभाने में हर रोज अपने समय को औसतन 352 मिनट का समय देती हैं वहीं पुरुष इन सब के लिए केवल 52 मिनट दिन भर में खर्च करते हैं। जहाँ महिलाओं का 9:00 से 5:00 वाली निश्चित समय की नौकरी करना ही एक बड़ी चुनौती हो वहाँ शोध कार्यों जैसी अनिश्चित समय सीमा वाले पेशे को करना महिलाओं के लिए बहुत कठिन हो जाता है।
विज्ञान से सम्बद्ध संस्थाओं में महिलाओं की मौजूदगी के मामले में भारत 69 देशों की सूची में लगभग सबसे निचले पायदान पर है। विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ के सर्वेक्षण के अनुसार ‘भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी’ में 2013 में कुल 864 सदस्यों में सिर्फ 52 महिलाएँ थीं। वर्ष 2014 तक इस संस्थान के 31–सदस्यीय अधिशासी समिति में एक भी महिला सदस्य नहीं थी। भारत की तुलना में अमेरिका, स्विट्जरलैंड और स्वीडन में राष्ट्रीय अकादमी के शासन मण्डल में 47 फीसदी महिलाएँ हैं, क्यूबा, नीदरलैंड और ब्रिटेन में विज्ञान अकादमियों में 40 फीसदी से अधिक महिलाएँ हैं।
हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और जलवायु संकट से निपटने में विज्ञान की एक खास भूमिका है और इसमें सभी की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि विज्ञान से पुरुषत्व को जोड़ने वाली धारणाएँ तोड़ी जाएँ। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के आंकड़े दर्शाते हैं कि विज्ञान, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित यानी स्टैम विषयों में महिलाओं द्वारा प्रकाशित शोध की संख्या कम है, उन्हें अपने शोध का मेहनताना भी कम मिलता है और पुरुष सहकर्मियों की तुलना में वे करियर में उतना आगे नहीं बढ़ पातीं।
वर्ष 2014–2016 तक के आंकड़े दर्शाते हैं कि सूचना व संचार टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में महिलाओं व लड़कियों की संख्या कम है– महिलाएँ कुल संख्या का महज तीन फीसदी हंै जबकि प्राकृतिक विज्ञान, गणित व सांख्यिकी में यह आंकड़ा पाँच फीसदी तक सीमित है।
महिलाओं की शोध संस्थाओं में संख्या को बढ़ाने के लिए समाज में महिलाओं की शिक्षा और उनकी सामाजिक भूमिका का फिर से बँटवारा करना पड़ेगा जिसमें महिलाओं की पारिवारिक जिम्मेदारी को परिवार में उचित ढंग से बाँटना पड़ेगा। उसके मातृत्व के गुण को महिला की कमजोरी की तरह नहीं बल्कि उसकी सामाजिक आवश्यकता की तरह देखा जाए तब ही महिलाओं को समाज में अपनी योग्यता दिखाने का सही अवसर मिल पाएगा। महिलाओं को परिवार से अलग उनके कार्य स्थलों पर सम्मान और सुरक्षित माहौल देना होगा उनके घरों से कार्य स्थलों तक आने–जाने के लिए सुरक्षित माहौल देना होगा तभी महिलाएँ आगे बढ़ कर अपनी योग्यता को दिखा सकेंगी।
–दीप्ति


पोलैंड का महिला आन्दोलन




पिछले साल जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही थी, तब पोलैंड की महिलाएँ अपने हक की लड़ाई भी लड़ रही थीं। महिलाओं की इस लड़ाई में देश के हर वर्ग–हर उम्र के लोग शामिल हुए। पोलैंड के पिछले तीस सालों के इतिहास में यह सबसे बड़ा आन्दोलन था। यह आन्दोलन महिलाओं के गर्भपात से सम्बन्धित कानूनों में बदलाव को लेकर हुआ। 
पूरे यूरोप में पोलैंड ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ गर्भपात से सम्बन्धित कानून बहुत ही कड़े हैं। साल 2016 में जब वहाँ की सरकार ने गर्भपात को निषेध करते हुए गैरकानूनी घोषित कर दिया था तब पूरा देश एकजुट होकर उठ खड़ा हुआ। लोगों ने काले कपड़े, पट्टा आदि बांध कर इस फैसले पर कड़ा विरोध जताया और पूरे देश में जगह–जगह भारी विरोध प्रदर्शन हुए। यह आन्दोलन ‘ब्लैक प्रोटेस्ट’ के नाम से पोलैंड के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। आन्दोलन के दबाव में आकर सरकार ने यह कानून वापिस ले लिया। पर जो नये कानून बनाये उनमें केवल विशेष परिस्थितियों में ही महिलाओं को गर्भपात का अधिकार मिला।
पोलैंड सरकार के अनुसार महिलाएँ सिर्फ तीन परिस्थितियों में ही गर्भपात करा सकती थीं––
(1) जब भ्रूण के कारण माँ की जान को खतरा हो।
(2) जब भ्रूण व्यभिचार या बलात्कार का परिणाम हो। 
(3) जब भ्रूण असमान्य हो और जन्म के बाद उसके जीवित बच पाने की सम्भावना न हो।
इन कड़े कानूनों को भी वहाँ की महिलाएँ थोड़े–बहुत विरोध के साथ ढोती रहीं।
अक्टूबर 2020 में पोलैंड के सर्वोच्च न्यायालय ने एक नया नियम प्रस्तावित किया जिसमें ऊपर दी गयी तीन परिस्थितियों में से अन्तिम को समाप्त किये जाने का फरमान था। इस आदेश के पक्ष में न्यायालय का तर्क था कि “सिर्फ महिलाओं की सुविधा के लिए अजन्मे बच्चे की हत्या ठीक नहीं” और “भ्रूण को भी दीक्षास्नान, अन्तिम संस्कार और माँ की गोद में दम तोड़ने का अधिकार मिलना चाहिए।”
न्यायालय के इस बेतुके तर्क पर आन्दोलनकारी महिलाओं का प्रतिउत्तर था कि एक अजन्मे शिशु के अधिकारों का बचाव करने में उनके अधिकार छीने जा रहे हैं। इस नियम के बाद महिलाओं को उनके अपने ही शरीर पर अधिकार नहीं रहेगा। सरकार चाहती है कि महिलाएँ उस परिस्थिति में भी बच्चे को जन्म दें जबकि बच्चा जन्म लेते ही या कुछ समय बाद ही दम तोड़ देगा। एक माँ के लिए इससे ज्यादा पीड़ादायक और भयावह क्या होगा!
सरकार के इस अमानवीय आदेश के विरोध में पोलैंड की महिलाएँ एक बार फिर से संगठित होकर संघर्ष के लिए तैयार हो गयीं। 22 अक्टूबर 2020 को महिला कार्यकर्ता सुशानो अपने कुछ साथियों के साथ न्यायालय पहुँची और वहाँ से वर्तमान सत्ताधारी पार्टी पीआईएस के मुखिया के घर तक मार्च निकाला। देश के 580 शहरों–कस्बों में विरोध–प्रदर्शन हुए और मार्च निकाले गये जिनमें लाखों लोग शामिल हुए। इन विरोध–प्रर्दशनों में न सिर्फ महिलाएँ, बच्चे, वृद्ध, पुरुष, छात्र सभी शामिल हुए। वहाँ के बस–टैक्सी चालकों ने भी अपनी गाड़ियों पर “वी आर विद यू” (हम तुम्हारे साथ हैं) लिखवाकर इस आन्दोलन का समर्थन किया।
भारी विरोध प्रर्दशनों के कारण इस कानून को अब तक लागू नहीं किया गया है। इस आन्दोलन के नेतृत्व का कहना है कि यह आन्दोलन अब सत्ताधारी पार्टी के इस्तीफे के साथ ही रुकेगा। पोलैंड के लोगों ने इस आन्दोलन को क्रान्ति का नाम दिया है। वह क्रान्ति जो नया सवेरा लायेगी!
इस आन्दोलन को तोड़ने की कोशिश में वहाँ की धर्मपरायण और चर्च की कठपुतली सरकार ने कई हथकण्डे अपनाये। निचले स्तर की राजनीति करते हुए वहाँ के शिक्षा मंत्री ने बयान दिया कि जिन विश्वविद्यालयों ने आन्दोलन का समर्थन किया, उनको दिये जाने वाले भत्तों में कटौती कर दी जायेगी। यहाँ तक कि महामारी को भी हथियार बनाने में इन्हें लाज नहीं आयी। सरकारी पक्ष के वकील ने कहा कि आन्दोलनकारी भीड़ इकट्ठी कर के महामारी को बढ़ावा दे रहे हैं। इन पर महामारी को जानबूझ कर बढ़ावा देने की धाराएँ लगायी जायेंगी, जिनमें आठ वर्ष तक की कैद का प्रावधान है।
इन सब घटिया राजनीतिक दाँव–पेंचों के बावजूद इस आन्दोलन ने सीना तान कर सरकार को चुनोती दी। महिलाएँ “माई बॉडी, माई च्वॉइस” (मेरा शरीर, मेरा चुनाव) के बैनर लिये कोरोना के दौर में अपनी जान की परवाह किये बिना, अपनी आजादी के लिए सड़कों पर डटी रहीं। 
इस नये कानून या गर्भपात से सम्बन्धित कानूनों में जो सख्ती है, उसका कारण जानना बहुत जरूरी है। पोलैंड की राजनीति में चर्च का बहुत अधिक प्रभाव है। चर्च के अनुसार भ्रूण की हत्या पाप है। चर्च के प्रभाव के चलते वहाँ की सरकार बार–बार गर्भपात विरोधी कानून बनाने के कोशिश कर रही है। जिससे कि यह पाप न हो। अब सवाल यह है कि इस पाप को पुण्य में बदलने की कीमत क्या है? उत्तर है– महिलाओं का उनके अपने शरीर और जिन्दगी पर अधिकार।
समस्या के मूल में जाएँ तो यह समझ आता है कि राजसत्ता पर धर्म का हस्तक्षेप ही वह कारण है जिससे पोलैंड में हलचल मच गयी। कोरोना महामारी के दौर में जब पूरी दुनिया अपने–अपने घरों हमें कैद थी, तब पोलैंडवासी सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए।
इतिहास गवाह है कि दुनिया में कहीं भी, जब–जब राजनीति पर धर्म का हस्तक्षेप हुआ है, परिणाम हमेशा ही बुरे रहे हैं। धर्म राजनीतिक स्वार्थ को साधने में ढ़ाल बन जाता है। बदले में राजनीति धर्म के सही–गलत, सभी नियमों का समर्थन करती है।
–अपूर्वा तिवारी

Thursday, April 22, 2021

अनसुने और अज्ञात मार्गदर्शक




भारत में जिन मुद्दों से दलित औरतों की जिन्दगी में प्रभाव पड़ता है अकसर वह नारीवादी आन्दोलन की चर्चाओं में कम ही आ पाते हैं। लेकिन फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों की छोटी जाति–बिरादरी की औरतें अपने हकों के लिए संघर्ष करती आई हैं। भारत में नारीवादी लैंगिक न्याय के लिए संघर्ष करती हैं– महिलाओं की गतिशीलता के अधिकार के लिए, लैंगिक हिंसा और भेदभाव के खिलाफ। लेकिन ये शहरी क्षेत्रों तक ही केन्द्रित है। उन संघर्षों ने महिलाओं के लिए प्रमुख जीत हासिल की है जो दोनों, प्रगतिशील कानूनी और सामाजिक मानदण्डों में परिवर्तन को सामने ला रहे हैं।
हालाँकि भारत में दलित महिलाओं को अपने हकों के लिए कई जमीनी संघर्षों का नेतृत्व किया, जबकि उन्होंने खुद को नारीवादियों के रूप में नहीं पहचाना होगा। यह संघर्ष 1970 के दशक में उत्तराखण्ड के चिपको आन्दोलन से लेकर केरल के श्रमिक हड़ताल तक के हैं। यह संघर्ष बेहद स्थानीय थे फिर भी उनका प्रभाव उनकी सोच से आगे निकल गया। उनमें से कुछ पर एक नजर डालते हैं–


श्रमिक हड़ताल
नर्सिंग जैसे महिलाप्रधान व्यवसायों में महिलाओं को आमतौर पर बहुत कम भुगतान किया जाता है। इन व्यवसायों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है या एक ‘सेवा’ का नाम देकर भुगतान कम किया जाता है। यहाँ तक कि शारीरिक श्रम सहित अन्य व्यवसायों में, लिंग के आधार पर वेतन में अन्तर बना रहता है। केरल में चाय बागान श्रमिकों और नर्सों ने हाल ही में इस तरह के भेदभाव को खत्म करने में कामयाबी हासिल की। केरल के मुन्नार के चाय बागानों में चाय की पत्ती चुनने वाली अधिकांश महिला मजदूर दलित हैं, जो दशकों पहले तमिलनाडु से पलायन कर गई थीं। वे कठोर परिस्थितियों में प्रतिदिन 14 घंटे न्यूनतम दैनिक मजदूरी 232रु के लिए काम करती थी, जबकि राज्य में शारीरिक काम करने वाले मजदूरों के लिए औसत दैनिक वेतन 500रु से अधिक था। महिलाएँ बिना शौचालय वाले टिन शेड में रहती थीं और उनके बच्चे अकसर स्कूली पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते थे।
2015 में, जब बागान प्रबन्धन ने श्रमिकों के वार्षिक बोनस को आधा कर दिया, तो कुछ महिला कार्यकर्ता मौन विरोध में मुन्नार की सड़कों पर बैठ गयी। कुछ ही दिनों में प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग 12,000 हो गई। समूह ने खुद को पोम्बिलाई ओरूमई नाम दिया। पुरुष प्रधान ट्रेड यूनियन में महिलाएँ बहुत कम बोला करती थीं, इसलिए विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्होंने शोषणकारी ट्रेड यूनियनों और अपने ही घर के मर्दों को प्रदर्शन से दूर रखा।
एक महीने के अन्दर, राज्य सरकार को कदम उठाना पड़ा और प्रबन्धन को श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी को 301रु तक बढ़ाना पड़ा। ओरुमई के कुछ नेता स्थानीय निकाय तक के चुनाव जीत गए। यह भारत में सम्भवत: पहली बार था जब आम महिला श्रमिकों के एक समूह ने प्रबन्धन और स्थापित यूनियनों का मुकाबला करते हुए सफलता हासिल की।
इसी तरह केरल के निजी अस्पतालों में काम करने वाली नर्सों ने 2017 में उचित वेतन के लिए संघर्ष किया और जीत हासिल की। बेहद कम भुगतान पाने वाली नर्सों ने 2012 में संगठित हो विरोध प्रदर्शन किया, जिसके बाद उनका मासिक न्यूनतम मूल वेतन बढ़ा कर 9500रु कर दिया गया। लेकिन कई अस्पताल प्रबन्धकों ने इस राशि का भुगतान नहीं किया। दबाव और प्रबन्धन के खतरों के बावजूद 2017 में राज्य भर के अस्पतालों में नर्सों ने एक महीने तक लगातार हड़ताल की। राज्य सरकार ने तब नर्सों के संघ और प्रबन्धन के साथ बातचीत की। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त जगदीश प्रसाद समिति की सिफारिशों के अनुरूप नर्सों का न्यूनतम वेतन 20,000रु तक बढ़ा दिया गया।
बेंगलुरु में भी महिला श्रमिकों के बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। अप्रैल 2016 में शहर में ठहराव आया, क्योंकि कपड़ा कारखाने की हजारों महिला मजदूरों ने अन्य श्रमिकों के साथ सड़कों पर अनायास कब्जा कर लिया। फैक्ट्रियों में शोषण और यौन उत्पीड़न का सामना करने वाली महिलाएँ केन्द्र सरकार की श्रमिकों के पीएफ खातों तक पहुँच को प्रतिबन्धित करने की योजना का विरोध कर रही थी। सरकार को इस विचार को तुरन्त त्यागने के लिए मजबूर होना पड़ा।


पर्यावरण संरक्षण के लिए विरोध
जब जल–जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधन नष्ट हो जाते हैं तो हाशिये के समुदायों की महिलाएँ सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। 1970 के दशक की शुरुआत में उत्तराखण्ड में महिलाओं ने पेड़ों की कटाई रोकने के लिए ‘चिपको आन्दोलन’ की शुरुआत की। सरकार की नीतियों और वाणिज्यिक हितों के कारण क्षेत्र के जंगल तेजी से घट रहे थे, जिसके परिणाम स्वरूप बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आर्इं। इसने गढ़वाली समुदाय की वन संसाधनों तक पहुँच सीमित कर दी। समुदाय की महिलाएँ जीवन यापन के लिए लघु वन्य–उपज इकट्ठा करती थीं। चिपको आन्दोलन की परिकल्पना सर्वोदय सदस्यों (विनोबा भावे के अनुयायियों) के एक समूह द्वारा की गई थी, लेकिन यह गढ़वाली महिलाएँ थीं जिन्होंने इसे एक आन्दोलन में बदल दिया। गौरा देवी व अन्य महिलाओं ने अपने गाँवों में महिलाओं को संगठित किया, उन्होंने उन पेड़ों को गले लगाया जिन्हें कोई भी काटने का प्रयास कर रहा था। अन्तत: राज्य सरकारों ने जंगलों में अस्थाई रूप से पेड़ों की कटाई पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
चिपको के समान ही ‘झारखण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन’ (जेजेबीए) है। आदिवासी समुदायों के नेतृत्व में यह राज्यव्यापी आन्दोलन सन 2000 से बढ़ रहा है। इस आन्दोलन का उद्देश्य जनजातीय समुदायों को जंगल में अधिकार दिलाने और इसे व्यवसायिक शोषण से मुक्त कराना है। यहाँ भी महिलाएँ सबसे अधिक प्रभावित हुर्इं और आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहीं। उनके सहज विरोध ने पुलिस और वन अधिकारियों को पीछे हटने और यहाँ तक कि पेड़ों की कटान की योजनाओं को छोड़ देने पर मजबूर किया। उदाहरण के लिए कर्मा बेड़ा गाँव में जब वन विभाग के अधिकारियों ने व्यावसायिक रूप से उपयोगी नीलगिरी के पेड़ लगाने की कोशिश की, तो जेजेबीए महिलाओं ने लाठी और दरान्ती के साथ उनका सामना किया। अधिकारी बाद में वहाँ कभी नहीं लौटे। झारखण्ड के जंगल अब जेजेबीए की निगरानी में पुनर्जीवित हो रहे हैं।
केरल के प्लाचीमाडा गाँव में, आदिवासी महिलाओं ने शक्तिशाली कोका–कोला कम्पनी के खिलाफ लड़ाई जीती। कम्पनी का कारखाना, गाँव से पांच लाख लीटर भूजल खींच रहा था और भूजल को गम्भीर रूप से प्रदूषित कर रहा था। इसने ग्रामीणों के स्वास्थ्य और उनकी फसलों को प्रभावित किया। महिलाओं को अपने दैनिक कृषि काम और लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ा ताकि वे दिन में दो बार 5 किलोमीटर पैदल चलकर साफ पानी ला सकें। 50 वर्ष की कृषि मजदूर मयिलम्मा ने ‘कोका–कोला विरुद्ध समिति’ की स्थापना की, जिसने कारखाने के बाहर लगातार विरोध प्रदर्शन किया। समुदाय की महिलाओं ने भी कई प्रदर्शनों का नेतृत्व किया और गिरफ्तारियों का सामना किया। आखिरकार 2004 में कारखाना बन्द कर दिया गया, पर इसके 4 साल बाद ही इसका संचालन पुन: शुरू हो गया।


शराबबन्दी और घरेलू हिंसा के खिलाफ लड़ाई
90 के दशक की शुरुआत में आन्ध्र प्रदेश में ग्रामीण महिलाओं ने अपमानजनक शराबी पतियों से तंग आकर राज्यव्यापी शराब विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व किया। इसकी शुरुआत तब हुई जब वर्धनिनी रोसम्मा नामक छात्रा अपनी पाठ्यपुस्तक की एक कहानी से प्रेरित हुई, जिसमें एक महिला एक शराब लॉबी के खिलाफ लड़ती है। रोसम्मा ने नेल्लोर जिले के अपने पैतृक गाँव डबगुंटा में महिलाओं को संगठित किया। समूह ने स्थानीय ताड़ी के ठेके पर झाड़ू और मिर्च पाउडर से हमला किया और इसे बन्द करने के लिए मजबूर कर दिया। इस ने राज्य भर की महिलाओं को आन्दोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। उनके विरोध में आन्ध्र प्रदेश सरकार को 1993 में देसी शराब पर प्रतिबन्ध लगाने और 1995 में शराबबन्दी लागू करने के लिए मजबूर किया, हालाँकि यह अस्थाई रूप से ही था।


उत्तर प्रदेश में एक महिला सतर्कता समूह है जो अब गुलाबी गैंग के नाम से जाना जाता है। 2003 में यह समूह सबसे दूरस्थ और सबसे पिछड़े इलाकों में से एक में शुरू हुआ था, जब अधेड़ सम्पत पाल देवी ने एक व्यक्ति को अपनी पत्नी को पीटने से रोकने की कोशिश की थी, उस व्यक्ति ने सम्पत को गालियाँ दी। अगले दिन सम्पत लाठियों के साथ महिलाओं के समूह को लेकर आई और उस आदमी की पिटाई कर दी। अब समूह में हजारों महिलाएँ हैं जिसमें से ज्यादातर निचली जातियों की हंै, जिनके पास न्याय की पहुँच नहीं है। उन्होंने गुलाबी रंग की साड़ियाँ और लहंगे पहने। यह समूह हिंसा की शिकार महिलाओं की सहायता करता है और उन्हें आजीविका कमाने में मदद करता है। इसके अलावा यह दहेज, बाल विवाह आदि को रोकने की दिशा में भी काम करता है। इसने भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भी कार्यवाही की है।
आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी शराबबन्दी के लिए संघर्ष जारी है, पोम्बिलाई ओरूमई आन्दोलन की नेताओं को मुख्यधारा के राजनीतिक दलों द्वारा बार–बार निशाना बनाया जाता है। लेकिन इन संघर्षों ने न केवल एक विशिष्ट माँग को पूरा किया बल्कि अपने समुदाय में महिलाओं की स्थिति को बदल दिया।
उदाहरण के लिए चिपको आन्दोलन और जेजेबीए, दोनों में महिलाएँ अपनी पारम्परिक भूमिका से आगे बढ़ीं। गढ़वाली महिलाओं का अपने ग्राम सभाओं में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था, वास्तव में अपने ही समुदाय के लोगों ने ‘विकास’ के नाम पर चिपको आन्दोलन का विरोध किया। लेकिन अधिकांश महिलाओं ने विरोध से डर कर भागने की बजाय ग्राम सभाओं में अपने लिए प्रतिनिधित्व की माँग की। पोम्बिलाई ओरूमई महिलाओं का कहना है कि उनके पति उनके साथ अब दुर्व्यवहार नहीं करते हैं। 
बड़े स्तर पर इन आन्दोलनों ने मिसाल कायम की है और वैश्विक मीडिया का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। इन आन्दोलनों पर अकादमिक शोध भी किये गए है। कुछ आन्दोलनों को अन्यत्र भी दोहराया गया है। उदाहरण के लिए, चिपको आन्दोलन उप–हिमालय क्षेत्र के साथ–साथ पश्चिमी घाटों को बचाने के लिए कर्नाटक में अप्पिको आन्दोलन के नाम से हुआ। यहाँ तक कि जापान में भी इस तर्ज पर 2009 में एक आन्दोलन हुआ। भले ही इन संघर्षों को औपचारिक रूप से नारीवादी आन्दोलनों के रूप में पहचान नहीं मिली लेकिन इन्होंने देश–विदेश में महिलाओं के अधिकारों के पाठ्यक्रम को बदल दिया है।
––नव्या पी के (अनुवाद - शालिनी)


पर्यावरण और नारीवाद




जीवन, प्रकृति, पृथ्वी, पर्यावरण पारिस्थितिकी कोई भी एक नाम लो, स्त्रीत्व की गूँज सुनाई देती है। इसी तरह पालन, पोषण, प्यार, करुणा और सहानुभूति आदि मानवीय गुण भी स्त्रीत्व के बोधक होते हैं। शुरू से ही माना जाता रहा है कि पुरुषों की तुलना में औरतें प्रकृति के ज्यादा करीब होती हंै। जब भी पर्यावरण के क्षरण और प्राकृतिक संसाधनों के अनुचित और अन्यायपूर्ण दोहन की बात होती है तो सवाल यह उठता है कि कौन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होता है? इसका जवाब भी तुरन्त हाजिर हो जाता है– सदियों से दमित समुदाय, और जब भी दमित समुदाय की बात हो तो औरत सबसे पहले स्थान पर होती है। पर्यावरण विनाश और औरतों पर पुरुषों के प्रभुत्व दोनों की वजह भी एक सी ही हैं, वह है पितृसत्ता और पूँजीवाद।
दो सौ सालों के उपनिवेशवाद और पूँजीवाद के वर्चस्व के चलते ही हम आज इस हालत में पहुँचे हंै, इसी के कारण हम पर्यावरण सम्बन्धी तमाम समस्याएँ झेल रहे हैं। हालाँकि औद्यौगिकरण के चरम के साथ औरतों ने सामाजिक कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता के लिए कई संस्थाओं और आन्दोलनों को जन्म दिया और उन्हें पनपाने में अपनी पूरी ऊर्जा खपाई है।
सन् 1970 में फ्रांस की फेमिनिस्ट फ्रेंकोइस द युबों ने सबसे पहले पर्यावरण और औरतों के परस्पर सम्बन्ध को एक नाम दिया– इको फेमिनिज्म। जिसने एक आन्दोलन का रूप लेकर सहज ही इस ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
पर्यावरण स्त्रीवाद यानि इको फेमिनिज्म के अनुसार स्त्री और पर्यावरण पारिस्थितिकी के बीच एक अटूट सम्बन्ध है क्योंकि दोनों ही पितृसत्ता और पूँजीवाद के शिकार हैं। 
समाज की रचना के क्रम में पितृसत्तात्मक मूल्यों के प्रभुत्व को स्थापित किया गया। इको फेमिनिज्म के अनुसार, संसार के सभी दमित समुदाय अगर संगठित होकर सामाजिक पदानुक्रम (हेरार्की) को तोड़ सकें तो एक नये समावेशी समाज का निर्माण हो सकता है। अफसोस तो यह है कि मानव जाति पर्यावरण को ठीक उसी तरह नियन्त्रित करना चाहती है जैसे पितृसत्ता स्त्री जाति को करती है, वैसे ही जैसे अमीर गरीबों पर और गोरी चमड़ी वाले लोग काले भूरे लोगों को हीन मान कर उनपर अपनी श्रेष्ठता का अभिमान जताते हैं।
पर्यावरण स्त्रीवाद के अनुसार समाज में औरतों के साथ जो व्यवहार किया जाता है, ठीक वैसा ही मनुष्य जाति प्रकृति के साथ करती है, यही नहीं, पाश्चात्य दर्शन और यहाँ तक कि विज्ञान ने भी औरतों को पुरुषों से कमतर आँकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सोचने का यह दमनकारी नजरिया पूर्णत: पूर्वाग्रह ग्रसित था। स्त्री और प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व ने समाज में हेरार्की को स्थापित किया। मूल्यों का यह दोगलापन ही स्त्री और पर्यावरण की बुरी दशा का जिम्मेदार है। खासकर तीसरी दुनिया के देशों में जहाँ औरतें ही घर की मुख्य संग्राहक होती हैं, उन्हें र्इंधन और पानी के लिए तथा अन्य बुनियादी जरूरतों के लिए घोर श्रम करना पड़ता है, जो पर्यावरण के विनाश का सर्वाधिक दुष्प्रभाव झेलती हैं, जबकि वह घरेलू प्रबन्धन की कर्ता–धर्ता होने के कारण कृषि, जल, जंगल, जमीन और घरेलू अर्थशास्त्र के आपसी सम्बन्ध को अच्छी तरह समझती हैं। 
एक अध्ययन के हिसाब से किसी भी इलाके के पुरुषों की अपेक्षा वहाँ की औरतें वहाँ के क्षेत्रीय पेड़–पौधों की पहचान करने और उनका प्रचलित नाम बताने में ज्यादा सफल रही हैं। पहचान की यह क्षमता उन्हें उनके उत्तरदायित्वों के निर्वहन से मिली है। 
पश्चिमी और अमीर देशों में भी गरीब लोग रेडियोएक्टिव कचरे के जहरीले साये में जीने को मजबूर हैं। लिंगभेद, रंगभेद जातिभेद, वर्गभेद ने यहाँ तक कि प्रजातिभेद ने जाने–अंजाने मनुष्यता का गला घोंटने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
इको फेमिनिज्म जैसा कि उसके नाम से जाहिर होता है, फेमिनिस्टों की पर्यावरण के प्रति चिन्ता मात्र नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक और गहरी चेतना से ओतप्रोत आन्दोलन है। जहाँ एक ओर यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दायरे में मौजूद लिंग भेद को खत्म करने की और एक नयी व्यवस्था की वकालत करता है, वहीं दूसरी ओर न सिर्फ मनुष्य जाति बल्कि पृथ्वी पर मौजूद समस्त प्राणियों जीव–जन्तु और पेड़–पौधे के अस्तित्व की रक्षा के लिए निरन्तर संघर्ष की भी हिमायत करता है, अपने अलग–अलग विभिन्न गुणों क्षमताओं के कारण जिन भी प्रजातियों का लगातार दोहन और शोषण किया जाता है, उन्हें अस्तित्व के संकट से उबारा जाए तभी प्रकृति में सन्तुलन बना रहेगा और पृथ्वी पर आसन्न संकट टल सकेगा।
इसी तरह इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था में जबतक नेतृत्व में औरतों की भागीदारी कम होगी और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का विकास नहीं हो जाता तब तक समानता की बात करना बेमानी है।
समानता के लिए संघर्ष और पूरे दमित समुदाय को उसके अधिकारों के लिए जागृत करने के साथ–साथ समाज का मूल्यांकन करते हुए यह भी जानना जरूरी है कि आखिर हम ऐसे क्यों हैं?
क्या हम वास्तव में पर्यावरण की चिन्ता करते हैं? क्या हम इसकी रक्षा के लिए अपनी आदतों में बदलाव ला सकते हैं, या फिर सुविधा–भोगी बनकर मात्र नारे लगा कर ही अपना कर्तव्य पूरा हुआ मान लेते हैं?
क्या हम वास्तव में लिंग भेद जैसे कुविचार को घृणित और मनुष्यता के खिलाफ समझते हैं, या फिर आधुनिक न कहलाए जाने के डर से बस ऊपरी तौर पर इसका समर्थन करते हैं? 
क्या हम पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव–जन्तु, पेड़–पौधों के जीने के अधिकार और अस्तिव बचाने की जद्दोजहद के प्रति थोड़ा सा भी संवेदनशील हैं? या फिर हम इस पृथ्वी को वीर–भोग्या–वसुन्धरा मानकर शक्तिशाली और स्वार्थी मनुष्यों के हाथ का खिलौना बनने देंगे? इस तरह के अनेक सवाल आज हमारे सामने खड़े हैं जिनका हल इको फेमिनिज्म के मतानुसार जीवन के प्रचलित मूल्यों में बदलाव से सम्भव है। 
आक्रामक तौर तरीकों, शक्ति के दुरुपयोग, दमन करने की प्रवृति जैसे नकारात्मक मूल्यों के स्थान पर अहिंसात्मक व्यवहार, परस्पर सहयोग, देखभाल, रख–रखाव और सतत विकास जैसे मूल्यों को समाज में स्थापित किया जाना चाहिए। जो भी व्यक्ति इन मूल्यों पर विश्वास रखता है, वह इकोफेमिनिस्ट है। इस तरह यह विचार पूर्णत: किसी भी तरह के भेद को अस्वीकार करता है, और दमित–शोषित तथा वंचितों के पक्ष में दृढ़ता पूर्वक अपनी एक स्पष्ट सोच रखता है।
 पर्यावरण नीतिविद क्रिस कुओमो के अनुसार दमित समुदाय एक–दूसरे के साथ कटिबद्ध होकर खड़ा रहे तो ये समस्या काफी हद तक सुलझाई जा सकती है। वह तो स्त्री के प्रकृति के करीब होने को एक सांस्कृतिक मिथ मानती हैं, और इसे सामाजिक पक्ष से जोड़ती हैं। उनके अनुसार समाज द्वारा प्रदत्त कार्य ही उन्हें प्रकृति के तौर तरीकों को समझने में और मनुष्य के प्रकृति से जुड़ाव को बेहतर तरीके से समझने में कारगर साबित हुआ है। स्त्रियाँ प्रकृति पर हमारी भौतिक निर्भरता और उसकी शक्ति को बखूबी समझती हैं। समाज ने उसके हिस्से जो काम उसे सौंपे हैं उन्हीं की वजह से एक खास किस्म की संवेदनशीलता और सहानुभूति उसके अन्दर संचारित हुई है, वह नैतिक ज्ञान उसे अपने स्त्री शरीर की वजह से नहीं बल्कि उसके स्त्री शरीर को दी गई जिम्मेदारियों की वजह से मिला है। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण सन् 1973 में उत्तराखण्ड का चिपको आन्दोलन है, जब सुदूर पहाड़ की ग्रामीण स्त्रियों ने पेड़ों से चिपक कर कॉमर्शियल प्रयोग के लिए जंगल कटने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 
अमेरिका की नेटिव औरतों ने अपनी जमीन पर यूरेनियम के रेडियोएक्टिव कचरे को डम्प किए जाने का विरोध किया।
सन् 1977 में केन्या की महिलाओं ने वंगरी मथाई के नेतृत्व में लाखों पेड़ लगाकर मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए संघर्ष किया था, जिसे ग्रीन बेल्ट मूवमेंट के नाम से जाना जाता है। 1980 में हार्लेम की औरतों ने बंजर खाली जगहों पर सामुदायिक बगीचे लगाकर एक ग्रीन मॉडल की शुरुआत की जो धीरे–धीरे अमेरिका के डेट्रॉयट शहर से अन्य स्थानों पर भी पहुँच गया, जिन्हें गार्डेनिंग एंजेल्स के नाम से जाना जाता है।
अलग–अलग देशों और संस्कृतियों की हजारों औरतों ने जल प्रदूषण, भूमि क्षरण, वनों की कटाई, और मरुस्थलीकरण के खिलाफ रियो द जेनेरियो के अर्थ समिट साल 1992 में भाग लेकर अपनी आवाज बुलन्द की।
हाल ही में ओडिशा की महिलाओं ने जल, जंगल और जमीन को बचाने की मुहिम चलाई है। 
स्वीडन की 18 वर्षीय लड़की ग्रेटा थनबर्ग का पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संघर्ष बहुत उम्मीदें जगाने में कामयाब रहा है। 
 एक ओर तो पूरी दुनिया में बुनियादी स्तर (ग्रास रूट) पर पर्यावरण और स्त्रियों के जीवन को लेकर एक राजनैतिक समझ विकसित हुई है।  वहीं दूसरी ओर समाज में निरन्तर बढ़ती आक्रामकता, धार्मिक कट्टरता, दूसरों से घृणा, अनियन्त्रित उपभोग की प्रवृति, तथा प्रदर्शनप्रियता के कारण समाज के नैतिक मूल्यों का भी बुरी तरह ह्रास हुआ है, जिसके कारण स्त्री जाति पर क्रूरता और बलात्कार की घटनाओं में भयंकर वृद्धि हुई है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो हम जिस संकट के दौर से गुजर रहे हैं, उससे मुक्ति पाने के लिए और भी ज्यादा प्रयासों की सख्त जरूरत है। ऐसे में इको फेमिनिज्म की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।
आज जब हम क्लाइमेट एमरजेंसी का सामना कर रहे हैं, हमारी धरती और उसके बाशिन्दों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है, ऐसी परिस्थिति में समस्त दमित समुदाय को एकजुट होकर इस धरती को बचाने में अपना योगदान देना ही होगा वरना बहुत देर हो जायेगी।
-उषा नौडियाल

Tuesday, April 6, 2021

महिलाएँ राजनीतिक चर्चा क्यों न करें



 
 हमारे समाज में बहुत से लोग अकसर कहते हैं कि, ‘राजनीति एक खराब चीज है और हम राजनीति से दूर रहते हैं’, लेकिन यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण सोच है। राजनीति किसी भी समाज का एक अविभाज्य अंग होता है। हम राजनीति करें या न करें, इसका हमारे जीवन और हमारे भविष्य पर पूरा असर पड़ता है। हमारे समाज में एक कहावत है, “माँ भी बच्चे को तभी दूध पिलाती है, जब बच्चा रोता है”। इसी कहावत की तर्ज पर हम कह सकते हैं कि महिलाएँ जब तक अपने लिए खुद अपनी आवाज मुखर नहीं करेंगी, तब तक उन्हें भी इस समाज में अपने लिए कुछ नहीं मिलेगा। हमारे देश की कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका किस तरीके से काम करती हैं और किसके पक्ष में काम करती हंै, यह सब राजनीति से तय होता है, जाहिर है कि जो भी राजनीति करेगा, नीतियाँ भी उसी के पक्ष में बनेंगी। वे लोग अपने ही पक्ष में सुविधाएँ निर्मित करेंगे। इसलिए महिलाओं को भी अपनी समस्याओं की गहराई को समझते हुए राजनीति में बढ़–चढ़कर हिस्सेदारी करनी चाहिए, हालाँकि उसके लिए एक लम्बा संघर्ष करना पड़ेगा तभी हम लोग अपना हक–हकूक पा सकते हैं। 
हम लोग अकसर देखते हैं कि हर इनसान के पास चाहे वह किसी भी उम्र, लिंग, क्षेत्र, भाषा का हो, एक दूसरे से गप्पे मारने के लिए रुचि के अनुसार ढेर सारे किस्से–कहानियाँ और राजनीतिक–सामाजिक मुद्दे होते हैं। सभी लोग गपशप करते हुए अपने बाकी के काम भी निपटा रहे होते हैं। जिन्हें फिल्में देखना, गाने सुनना, कविता लिखना, कहानी पढ़ना, लिखना, जिम जाना, पूजा पाठ इत्यादि जो भी पसन्द होता है, वे उसी तरीके की बातें करते हैं। अक्सर देखने को मिलता है कि महिलाओं के बातचीत के मुद्दे, पुरुषों की बातचीत के मुद्दों से कुछ अलग होते हैं। जिसकी जिन्दगी जीने का जितना बड़ा दायरा होता है उसकी बातों में भी वह झलक रहा होता है। आम घरों में देखने को मिलता है कि घर के पुरुष सुबह उठकर चाय की चुस्की के साथ अखबार पढ़ते हैं फिर अपनी पसन्द की खबर के बारे में घर से लेकर दफ्तर तक राजनीतिक मुद्दों पर बातें करते हुए मिल जाते हैं। यहाँ तक कि वे रास्ते में भी अनजान लोगों से किसी ना किसी तरह की राजनीतिक बातें और बहसबाजी करते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। 
पुरुष किसी भी वर्ग, जाति या धर्म के हों, उनका कथन सही हो या गलत फिर भी वह राजनीतिक बातचीत में भागीदारी लेते हैं और किसी न किसी विचारधारा पर अपनी राय देने से पीछे नहीं हटते हैं। पुरुषों की बातचीत के मुद्दे में अधिकतर देश दुनिया, शेयर बाजार, चुनावी हार–जीत, अर्थव्यवस्था की सरगर्मी, क्रिकेट–फुटबॉल के टूर्नामेंट, महिलाओं पर लैंगिक भेदभाव पूर्ण टिप्पणियाँ, सिनेमा, अश्लील किस्से, धार्मिक चर्चाएँ और जमीन–जायदाद खरीदने–बेचने के विषय ज्यादा होते हंै। कुल मिलाकर देखा जाये तो पुरुषों की बातचीत के मुद्दे अमूमन घर और बच्चों के कामों से बाहर के होते हैं और उनकी बातचीत के मुद्दों में देश–दुनिया के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दे शामिल होते हैं। 
दूसरी तरफ, अगर महिलाओं की बातचीत के मुद्दों पर नजर डाली जाये तो हमें देखने को मिलेगा कि जिस महिला की जिन्दगी जीने का दायरा जितना छोटा होता है, उसकी बातचीत का भी दायरा बहुत ही सीमित होता है। आमतौर पर महिलाओं की बातचीत के मुद्दों में साफ–सफाई, फैशन, कपड़े, मेकअप, खरीदारी, बच्चों से सम्बन्धित बातचीत, आस–पड़ोस के लोगों के बारे में चर्चा, टेलीविजन या सीरियल के किस्से, घरेलू झगड़े या तारीफ, व्रत–त्यौहार की तैयारी ही होते हैं जबकि राजनीतिक और खेल सम्बन्धी बातें बहुत ही कम होती हैं। यहाँ तक कि महिलाएँ उसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा का समर्थन कर रही होती हंै, जिसका समर्थन उस घर के पुरुष कर रहे होते हैं। हमारे समाज में छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध इतनी अधिक संख्या में हो रहे हैं कि महिलाएँ ऐसे किस्सों को भी अपनी बातचीत में शामिल रखती हैं और उनसे बहुत ज्यादा असुरक्षित  भी महसूस करती हैं, लेकिन फिर भी वे इन अपराधों की जड़ तक नहीं सोच पाती हैं। सीधे शब्दों में कहा जाये तो अधिकांश महिलाओं की जिन्दगी में देश–दुनिया से जुड़े बड़े सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दे शामिल ही नहीं होते हैं। 
हालाँकि आज महिलाएँ सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन अगर आँकड़ों पर नजर डाली जाये तो आज भी बहुत ही कम महिलाएँ हैं जो राजनीति में, खेल में या सरकारी या निजी क्षेत्र के किसी बड़े पदों में हिस्सेदारी कर रही हैं। यही कारण है कि महिलाएँ आज भी बहुत से क्षेत्रों में पुरुषों से पिछड़ी हुई हैं और उन्हें अपनी बराबरी के लिए दिन–रात और हर कदम पर अपनी आजादी और सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है। 
महिलाओं की राजनीतिक मुद्दों में कम रुचि रखने के मुख्य कारण हैं–– कम शिक्षित होना, घरेलू काम में उलझे रहना, घरेलू मानसिकता का बन जाना, परम्परावादी जीवन शैली अपनाना, मीडिया द्वारा महिलाओं को माल के रूप में पेश करना,  सुन्दरता, शालीनता, आज्ञाकारी, ममता आदि गुणों को महिमामण्डित करना। जो महिलाएँ मुखर होकर अपनी समस्याओं को समाज के आगे रखती हैं और जो अपनी जिन्दगी अपनी मनमर्जी से जीती हैं, उन महिलाओं को विभिन्न तरीके से नीचा दिखाना और उनका चरित्र हनन शुरू कर दिया जाता है। यहाँ तक कि उन्हें कुलटा, वेश्या, घरतोडू जैसे नकारात्मक विशेषण दे दिये जाते हैं। 
दूसरी तरफ जो औरतें चुपचाप सर झुकाकर पुरुषों के हर सही–गलत फैसले का समर्थन करती हैं, उनको आदर्श स्त्री के रूप में समाज में स्थापित कर दिया जाता है। इसी के चलते महिलाओं ने खुद को उसी देवी स्वरूप आदर्श स्त्री के रूप में ढालने के लिए पुरुषों के आगे समर्पित कर दिया। हमारे पुरुष प्रधान समाज ने महिलाओं को हमेशा ही घरेलू कामों के सीमित घेरे के अन्दर ही उलझा करके रखा। उन्हें किसी भी बड़े सामाजिक या आर्थिक मसलों पर आगे बढ़ने ही नहीं दिया। पुरुषों ने हमेशा ही जमीन जायदाद, सम्पत्ति और यहाँ तक की महिलाओं के जीवन और उनके शरीर के ऊपर भी अपना ही पूरा अधिकार रखा। सदियों से महिलाओं के ऊपर पुरुषों ने विभिन्न नीति–नियम, कानून बनाकर तमाम तरीके की बंदिशें लगायीं और उनकी बेड़ियों को और मजबूत किया। 
हमें यह गौर करना चाहिए कि जितने भी वेद, पुराण, बाइबिल, कुरान, हदीस,  मनुस्मृति या अन्य धार्मिक ग्रंथ लिखे गये हैं उन सभी के लेखक पुरुष रहे हैं और उन पुरुषों ने अपनी सहूलियत के लिए स्त्रियों के बारे में बहुत सारे नीति–नियम उन किताबों में लिखे। इनके मुताबिक महिलाओं को हमेशा ही एक खास दायरे में बँ/ो होने को ही उनकी अच्छाई बताया गया है।  महिलाओं का राजनीति या शासन करना तो दूर की बात, उन्हें पढ़ने–लिखने से भी दूर रखने के पूरे प्रयास किये गये थे, ताकि वह चुपचाप पुरुषों द्वारा उनके ऊपर किए जा रहे शासन को गुलामों की तरह सहन करती रहे। इन सब चीजों ने धीरे–धीरे महिलाओं को और ज्यादा गर्त में डालने का काम किया। इसे ही महिलाओं द्वारा अपनी नियति मान लिया गया और उन्होंने खुद को राजनीति और सामाजिक दायरे से दूर कर लिया। 
आज 17 वीं लोकसभा में अब तक की सबसे ज्यादा 78 महिला सांसद हैं जो पूरे सांसदों की 14 प्रतिशत हैं। लेकिन यह संख्या महिलाओं की आबादी में हिस्सेदारी के हिसाब से बहुत कम है। बाकी क्षेत्रों में हालत और भी खराब है। राजनीति में शामिल महिलाएँ बाकी महिलाओं की सुरक्षा या बराबरी को लेकर कुछ खास भूमिका नहीं निभा रही हैं, बल्कि वह भी अचेतन रूप से इसी पुरुषवादी सत्ता का पोषण कर रही हैं। 
दुनिया भर में महिलाओं ने अपने अधिकारों को पाने के लिए आन्दोलन किये। सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं की पढ़ाई–लिखाई के लिए इस पुरुष प्रधान समाज से एक बड़ा सामाजिक जोखिम लिया था तब जाकर आज हम पढ़ और लिख पा रही हैं। यहाँ तक कि महिलाओं का अपने शरीर को लेकर भी कोई अधिकार नहीं था। आज जो गर्भनिरोधक दवाएँ बाजार में उपलब्ध हैं, उसके लिए भी महिलाओं ने यूरोप में एक बड़ा आन्दोलन किया था तब जाकर के उन्हें यह अधिकार मिला कि वह अपनी जरूरत और इच्छा के मुताबिक बच्चे पैदा कर सकें। 
19वीं सदी में महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे समाज सुधार आन्दोलन में 1890 के दौरान महाराष्ट्र की आनन्दीबेन और काशीबाई छाता और जूते पहन कर के जब निकली थी, तो उन पर लोगों द्वारा पत्थर फेंके गये थे यह कहकर कि, “यह पुरुषों के प्रतीक चिन्ह हैं।” ताराबाई शिन्दे ने जब ‘स्त्री पुरुष तुलना’ किताब लिखी थी और यह कहा था कि स्त्रियों और पुरुषों में कोई ज्यादा भेद नहीं है और वह एक समान हैं, तो उस पर भी समाज में बहुत तीखी बहस शुरू हुई थी। 
महिलाओं ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय भी स्वतंत्रता आन्दोलन में खुलकर हजारों लाखों की संख्या में अपनी राजनीतिक भूमिका सुनिश्चित की थी। लेकिन उसमें भी महिलाओं ने पितृसत्ता से आजादी के लिए और अपने लिए बराबरी को लेकर कोई भी बड़ा देशव्यापी सक्रिय आन्दोलन नहीं चलाया था। उसके बावजूद भी महिलाओं ने  बराबरी, स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए जब भी आवाज उठाई है और घरों से बाहर निकल कर के अपने हक माँगे हैं तो उन्हें उसमें कुछ हद तक जीत भी हासिल हुई और कई बार विरोध का सामना भी करना पड़ा। 
महिलाओं को 1956 में हिन्दू कोड बिल लागू करवाने के लिए भी आन्दोलन करना पड़ा था, जिसका बहुत से पुरुषों ने विरोध भी किया था, लेकिन उसके बावजूद भी अन्त में महिलाओं की ही जीत हुई। 
मुस्लिम महिलाओं ने भी जिन्हें हमेशा ही परदे में रहने और पराए मर्दों से दूर रहने की विभिन्न मौलवियों द्वारा फतवे दिये जाते थे। वह भी आज देश भर में हजारों जगह अपने हक के लिए बाहर निकल आती हैं और भारतीय संविधान और राजनीति को समझने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं। महिलाओं को जो अधिकार किसी भी धार्मिक किताब ने नहीं दिये, वे अधिकार उन्हें संविधान ने दिये हैं, यह बात आज बहुत सी महिलाओं को समझ में आ चुकी है। महिलाएँ आज बहुत से आन्दोलनों की अगुवाई कर रही हैं, चाहे वह स्कूल–कॉलेज, गली, मोहल्ले हो या संसद में। आन्दोलन चाहे स्वतंत्रता संग्राम का रहा हो या आज की वर्तमान परिस्थिति में नागरिकता संशोधन बिल को लेकर उन्हें पुरुषों ने अपने खुद के स्वार्थ के लिए भले समर्थन दिया हो, लेकिन फिर भी महिलाएँ हर जगह की तरह राजनीति में भी आगे आ रही हैं। महिलाओं की संख्या अभी भी आधी आबादी के हिसाब से बहुत ही कम है, फिर भी वह तरह–तरह के सामाजिक मुक्ति आन्दोलनों में भाग लेकर खुद की मुक्ति का भी रास्ता तलाश कर रही हैं।
–– स्वाति सरिता

Tuesday, March 23, 2021

मैं वह अजन्मी बच्ची हूँ



 
तनिष्क का मुस्लिम सास और हिन्दू बहु का विज्ञापन उतना ही दिलचस्प और खूबसूरत है जितने इसके बाकि विज्ञापन हैं। इसे वापस लेने का मतलब है कि यह एक अजीबो–गरीब कल्पना थी और इस तरह के रिश्ते असल में मौजूद नहीं होते। लेकिन ऐसा केवल वे दिखाते हैं। मैं इसकी एक जीती जागती मिसाल हूँ। मैं उस विज्ञापन की वही अजन्मी बच्ची हूँ।
मेरे माता–पिता जब 1971 में मिले तो उन्होंने “लव जिहाद” जैसा कोई भी शब्द नहीं सुना था। वे दोनों महाराष्ट्र के समाजवादी छात्र संगठन, युवक क्रान्ति दल से जुड़े थे, जो श्रम की लूट, जातीय उत्पीड़न, आदिवासी आबादी को हाशिये पर धकेलने जैसे मुद्दों को उठाते थे। जब मेरी माँ संगठन में आयीं तो वह 18 साल की हँसमुख, गोरी और हरी आखों वाली गोल–मटोल लड़की थी। उनके आस–पास के ज्यादातर मर्द उम्र में उनसे बड़े और अलग–अलग पृष्ठभूमि वाले, जैसे देहाती, गरीब, दलित, मुस्लिम थे। कई को तो उनसे देखते ही प्यार हो गया और उनसे शादी करने की इच्छा होने लगी। वास्तव में, माँ के लिए प्रस्ताव नाना के पास एक शान्त लड़के की तरफ से आया जो उनके परिवार की पृष्ठभूमि के लिए डरावना था। वह नलिनी पण्डित की बेटी थी जो एक मशहूर मार्क्सवादी–गाँधीवादी विद्वान् थे और यह पण्डित परिवार बहुत अमीर और जाना–माना था। इनके पास दादर में एक बहुत बड़ी कोठी, गाड़ी, और टेलीफोन जैसी चीजें भी थी।
जब उन्होंने अपने चिपलून के एक कोंकणी मुस्लिम साथी से शादी करने का फैसला किया तब दोनों ही तरफ धर्मान्धता थी। उनकी जान–पहचान वाली बूढ़ी औरतें उन्हें दादर की सड़को पर रोकती और पूछती, “तुम एक मुस्लिम से शादी करोगी? जरा सावधान रहना हाँ, उनके यहाँ तीन तलाक वाला सिस्टम है।” बाबा के बड़े भाई ने उनसे पूछा “अरे तुम एक हिन्दू लड़की से शादी क्यों करना चाहते हो।” बड़े भाई और कोई नहीं बल्कि हमीद दलवई थे, मुस्लिम सुधारवादी चैंक गये। उन्होंने सोचा की समाजवादी–गाँधीवादी शादी का तरीका भाड़ में जाये, हमें इस शादी का एक बड़ा जश्न मनाना चाहिए, ताकि सबको पता चले कि ये दोनों शादी कर रहे हैं। उन्होंने शादी के ढेर सारे कार्ड छपवाये और उन सभी को देते जो उनसे मिलते।
दादी की कहानियों के मुताबिक शादी में आये लोगों की कोई गिनती नहीं थी। हॉल भले ही छोटा था मगर हंगामाखेज था। लोग कोकम शर्बत के तीन हजार गिलास डकार गये। मेरे माता–पिता इतने लोगों की तरफ मुस्कुरायेऔर इतनों से हाथ मिलाये कि कुछ वक्त बाद उनके हाथ और गाल दुखने लगे। मेरी माँ के दोस्तों ने उनसे कहा “बाप रे, तुम्हारी शादी में इतनी जबरदस्त गलतफहमी है, हम खुशनसीब हैं कि वहाँ से सही–सलामत लौट आये।” शादी का जश्न मिर्जाली गाँव में भी मनाया गया, जहाँ दलवई परिवार ने पण्डित परिवार के लोगों और उनके दोस्तों के लिए बिरयानी तैयार की जो मुम्बई से गाड़ियों में आये थे।
यहाँ तनिष्क स्टाइल से कोई सोने के गहने ससुराल की तरफ से नहीं थे। हालाँकि, मेरी माँ जब पहली बार गाँव गयीं तो उन्हें चाँदी के झुमके मिले। “मगर चाँदी के तो कटोरियाँ और थाली बनते हैं”, उन्होंने मन ही मन में सोचा, सारस्वतों के दिवाली भोग को याद करते हुए। वर्गीय अन्तर इतना ज्यादा था! मगर वह एक समाजवादी आदर्श “क्षमता के हिसाब से दो, जरूरत के हिसाब से लो” के आधार पर नये परिवार गढ़ने में सफल रही। वह अपने मुम्बई कॉलेज से लेक्चरर के काम के जो पैसे मिलते थे, गाँव में अपने गरीब भाई–बन्धुओं को दे देती थी, क्योंकि मेरे पापा होल–टाइमर होने के चलते दिन–रात मजदूरों के जुलूस और आदिवासियों के साथ बातचीत में व्यस्त रहते थे। किसी की पढ़ाई के लिये पैसे भेजती थी, किसी को इलाज के लिए मुम्बई में अपने फ्लैट में बुला लेती थी या किसी की शादी की खरीदारी के लिए। वह उस कुनबे की सरदारनी थी।
तनिष्क ट्रोल्स को यह समझ में नहीं आता है कि एक चमकती आँखों वाली बहू मुस्लिम परिवार में इस तरह शामिल हुई जो सिर्फ महिलाएँ ही कर सकती हैं। यह लव जिहाद नहीं है, यह मुसलमानों की घर–वापसी है। लेकिन ट्रोल न केवल मुस्लिम विरोधी हैं बल्कि महिला विरोधी भी हैं। उन्हें लड़की “देने” में हार नजर आती है। उनको यह दिखा ही नहीं कि इस विज्ञापन में मुस्लिम परिवार हिन्दू त्योहार मना रहा है। मेरा परिवार ईद और दिवाली दोनों तरफ के रिश्तेदारों के साथ मिलकर मनाता है। खाना, रंगों से खेलना और रंग–बिरंगे कपडे़ पहनना सबको पसन्द है। इसमें नापसन्द करने वाली कौन सी बात है?
मेरी माँ अब भी हिन्दू हैं, जैसे मेरे पिता मुस्लिम हैं। दोनों में से कोई धार्मिक अनुष्ठानों का पालन नहीं करते हैं, लेकिन सांस्कृतिक उत्सव का आनन्द जरूर लेते हैं। शुरू के दिनों में, बुजुर्ग रिश्तेदारों ने मेरी माँ को सुझाव दिया कि उन्हें इस्लाम अपना लेना चाहिए, तभी उन्हें जन्नत मिलेगी। वह हँसती और कहतीं, “लेकिन मैं एक भौतिकवादी हूँ। मुझे बताएँ कि मुझे इस जीवन में, कहाँ और कैसे फायदा होगा।” वास्तव में उन्होंने शादी के कुछ महीने बाद अपनी पहचान को जाहिर करने के लिए एक बड़ी लाल बिन्दी पहनना शुरू कर दिया। बिन्दी और साड़ी ने उन्हें गंभीर और पेशेवर दिखने में भी मदद की, क्योंकि उन्होंने अर्थशास्त्र पढ़ाना शुरू कर दिया था और वह अपने छात्रों की तरह जवान दिखती थी। उन्होंने अपनी क्रान्तिकारी लड़ाई जारी रखी और हमारी परवरिश में एक वैकल्पिक मूल्य का इस्तेमाल किया।
उन्हें इस बात की परेशानी थी कि उनके बच्चे कैसे बढ़ते साम्प्रदायिक माहौल का सामना करेंगे। उन्होंने हमें रूसी किताबें और अन्य अन्तर्धमीय परिवारों और दोस्तों के माध्यम से एक सुरक्षित दुनिया देने के लिए कड़ी मेहनत की। फिर भी वे हमें दंगे, दुश्मनी और असुरक्षा से बचा नहीं सके। हमने विदेश यात्रा की, भले लोगों से जान–पहचान हुई, पढ़ाई और किताबों का मजा लिया और अपने परिवार की विविधता को आगे बढ़ाया।
मेरे भाई ने हैनान प्रांत की एक चीनी से शादी की और मैंने तेलंगाना रेड्डी के साथ जिन्दगी साझा करने का फैसला लिया। मैंने नागालैंड की एक बेटी मोन को भी गोद लिया। अब जब सभी बच्चे एक सार्वजनिक पार्क में एक साथ खेलते हैं,  एक अर्द्ध–चीनी लड़का, मराठी–तेलुगु लड़की और छोटी सी नागा योद्धा, आस–पास के लोग हैरत के साथ हमें देखते हैं। यह परिवार एक ही साथ अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, तेलुगु, मन्दारिन और कोंकणी में बात करता है।
और जब पूरी तरह एकांगी सोच वाले “सामान्य” लोग आकर हमसे पूछते हैं “लेकिन कैसे?” या “वाकई–––?” तो हम सिर्फ मुस्कुरा देते हैं। हमारा जीवन ट्रोल करने वालों का जवाब है। हम मौजूद हैं। अन्तर्धर्मीय परिवार न केवल जिन्दा है बल्कि पनपता भी है। और आप सब इसके आगे फीका पड़ जाते हैं।
–– समीना दलवई
(‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से साभार, अनुवाद– उत्सा प्रवीण)

भारतीय किसान आन्दोलन को मजबूत बनाती महिलाओं से बातचीत



भारत में भूमि ही किसानों की माँ है, और यहाँ की माताएँ, बहनें और बेटियाँ इस आन्दोलन का एक मजबूत आधार बनी हुई हैं। 
50 साल की बलजीत कौर पंजाब (भारत) में ताउम्र खेती करती रही हैं। उनके लिए फसलों को उगाना, अपनी जमीन पर उनकी खेती करना सिर्फ एक पेशा नहीं है बल्कि उससे कहीं ऊपर एक वरदान की तरह है– यह उनके खून में है। 
यदि कोई सामान्य दिन होता, तो बलजीत कौर अपने खेतों में एक लम्बा समय बिता रही होतीं, ध्यान से बीजों को बोती और फसलों की कटाई कर रही होतीं। यह काम आसान नहीं है, लेकिन वह इसके लिए पूरी तरह समर्पित हैं। इसके बावजूद वह आज अपने खेतों में नहीं बल्कि भारत की राजधानी नयी दिल्ली की सीमा टिकरी बॉर्डर पर हैं, जहाँ वह और सैंकडों किलोमीटर दूर से आए अन्य महिला व पुरुष किसान सितम्बर में पास हुए नये कृषि कानूनों के खिलाफ धरने पर बैठे हैं। 
बलजीत कहती हैं, “हम अपनी जमीनों के लिए इन काले कानूनों के खिलाफ लड़ रहे हैं जो मोदी ने लागू किये हैं।” उन्हें डर है कि इन नये कृषि कानूनों के कारण उन जमीनों का मालिकाना जो पीढ़ियों से उनके परिवारों के पास रहा है, उनसे छिन जाएगा और उसे पाने के लिए वे दृढ़ निश्चयी हैं। 
किसान इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि ये तीन कानून जो कृषि क्षेत्र को बर्बाद करने के लिए बनाए गए हैं, एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य), सरकार द्वारा तय किया गया वह न्यूनतम मूल्य जिस पर किसान अपनी फसल बेच सकता है, की गारण्टी नहीं देते। बिना इस सुरक्षा मूल्य के किसानों को इस बात की आशंका है कि उन्हें प्राइवेट कम्पनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करनी पड़ेगी जहाँ ये कम्पनियाँ तय करेंगी कि किसान क्या उगाएगा और किस दाम पर बेचेगा। ये नियम कम्पनियों के, खेती की जमीनों को खरीदने व खाद्य सामग्री के संचय पर लगे प्रतिबन्ध को भी खत्म करते हैं। 
जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह दावा कर रहे हैं कि ये कानून कृषि क्षेत्र को आधुनिक बना देंगे और किसान इस बात पर जोर दे रहे हैं कि एमएसपी की गारण्टी दिए बिना कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और बड़े स्तर पर निजीकरण के लिए कृषि बाजारों को खोल देना पहले से शोषित वर्गों के और अधिक शोषण को आसान बना देगा।
पिछले कुछ हफ्तों में, इन नये कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन ने जोर पकड़ लिया है। सैंकड़ों–हजारों प्रदर्शनकारियों ने कृषि क्षेत्र में अग्रणी तीन राज्य पंजाब, हरियाणा और उत्तर–प्रदेश से देश की राजधानी दिल्ली की मुख्य सीमाओं– सिंघू और टिकरी बॉर्डर पर धरना प्रदर्शन करने के लिए रैली निकाली। 
सरकारी आकाओं की प्रदर्शनकारियों को शहर में न घुसने दे पाने की लाख कोशिशों के बावजूद भी किसानों के उत्साह में किसी तरह की कोई कमी नहीं दिखी। उनकी साधारण सी माँग है– काले कानूनों को वापस लो। 
“महिलाएँ पुरुषों से अधिक मेहनत करती हैं”
भारत मे प्रदर्शन कर रहे किसानों की सार्वजनिक छवि पर जहाँ पुरुषों का पलड़ा भारी है, वहीं महिलाएँ भी कुछ कम नहीं है। बल्कि महिला किसान तो इन नये कानूनों से सबसे अधिक प्रभावित होंगी। 
महिला किसान अधिकार मंच (एमएकेएएएम), एक भारतीय मंच जो महिला किसानों के अधिकारों के लिए आवाज उठाता है के अनुसार– सम्पूर्ण कृषि कार्यों का लगभग 75 प्रतिशत कार्य महिलाओं द्वारा किया जाता है, इसके बावजूद भी वें केवल 12 प्रतिशत जमीनों की मालिक हैं। 
एमएकेएएएम की कविता कुरुगंती कहती हैं कि महिला किसान जमीनों पर अपने मालिकाने हक की कमी के चलते धीरे–धीरे गायब होती जा रही हैं। कृषि क्षेत्र में व्यापक योगदान होने के बावजूद भी जमीनों पर हक न होने के कारण उनको किसान नहीं माना जाता और उनका इस कदर हाशिये पर आ जाने का अर्थ ये निकलता है कि वे इन नये कानूनों के तहत बड़ी–बड़ी कम्पनियों द्वारा किये जाने वाले शोषण से सबसे अधिक प्रभावित होंगी। 
खेती में मूल्य निर्धारण के मामले में सरकारी संरक्षण की कमी लिंग–भेद को और अधिक बढ़ावा देगी क्योंकि कृषि क्षेत्र में बढ़ती हुई प्रतियोगिता के आधार पर यह माना जाता है कि महिलाओं के बहुत सी सीमाओं जैसे– यातायात के साधनों की पहुँच से दूरी, घर की जिम्मेदारियाँ इत्यादि में बंधे होने के चलते उनके साथ पुरुषों की तुलना में व्यापार करना कहीं अधिक आसान होता है।
कुलविन्दर कौर और परमिन्दर कौर (‘कौर’ सभी सिक्ख महिलाओं को दिया जाने वाला एक उपनाम है) दो महिला किसान हैं जो 645 किलोमीटर (400 मील) की यात्रा करके जालंधर (पंजाब) से टिकरी पहुँची। उन्होंने अपने ट्रकों को खड़ा करके उसके पीछे वाले हिस्से में कैम्प लगा लिए और अन्य महिला प्रदर्शनकारियों के साथ धरने प्रदर्शन पर बैठ गयीं जब उन्होंने अलजजीरा को यह सब बताया। 
कुलविन्दर पूछती हैं, “जब कोई निश्चित मूल्य अथवा सरकारी मण्डी ही नहीं होगी तो कैसे हम अपने बच्चों को रोटी खिलाएंगे और कैसे ही अपनी फसलों को बेचेंगे?”
परमिन्दर भी आगे कहती हैं, “कोई काम आसान नहीं होता, आपको खाने के लिए काम करना ही पड़ेगा। लेकिन यदि काम करने के बाद भी हमें खाना न मिले, तो यह सचमुच बहुत गलत है।”
वे इस बात से चिन्तित हैं कि इन कानूनों के लागू हो जाने का अर्थ होगा– बड़ी–बड़ी प्राइवेट कम्पनियों के लिए काम करना जो उन्हें उनकी हाड़तोड़ मेहनत का बहुत कम मूल्य देंगी। दोनों महिलाएँ तर्क देती हैं कि निश्चित तौर पर ये बड़ी–बड़ी कम्पनियाँ किसानों से बहुत कम दाम पर उनकी फसलों को खरीदेंगी और लगभग चार गुना अधिक दाम पर उन्हें शहरों में बेच देंगी। 
60 साल की मलकीत कौर जो पिछले 30 सालों से खेती कर रही हैं तर्क देती हैं कि पंजाब में उनके गाँव मे बहुत सारी महिलाएँ खेती करती हैं और पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक मेहनत करती हैं। 
आन्दोलन के सन्दर्भ में भी देखें तो जो महिलाएँ घर–परिवार व खेतों की देख–रेख के लिए घरों में रुकी हुई हैं, वे भी आन्दोलन में उतना ही बहुमूल्य योगदान दे रही हैं जितना कि दिल्ली की सीमाओं पर बेहद ठण्डी व विषम परिस्थितियों में पुरुषों के समकक्ष खड़ी महिलाएँ दे रही हैं। 
मलकीत खास तौर पर आन्दोलन में भागीदारी देने के लिए सिंघू बॉर्डर आयी हैं क्योंकि वह इस बात से बेहद परेशान हैं कि एमएसपी की गारण्टी न होने से उनकी आमदनी पर असर पड़ेगा। 
“यदि वे हमारी फसलों के दाम कम करते हैं तो हम कहाँ जाएँगे?”
अपनी इन आशंकाओं के बावजूद भी मलकीत यह उम्मीद करती हैं कि कानून वापस ले लिए जाएँगे और अपने इस दृढ़ विश्वास पर उनको पूरा यकीन है, वह कहती हैं, “मुझे पूरी उम्मीद है कि भगवान हमारी सुनेगा, हम इसीलिए यहाँ आये हैं।” हालाँकि मलकीत अगले दिन यहाँ से जा रही हैं, वह कहती हैं कि अब उनके परिवार से कोई और उनकी जगह लेगा। प्रदर्शनकारियों के लिए यह रास्ता अभी बहुत लम्बा है। 
“यह जीवन जीने का कोई अर्थ नहीं यदि हमारे बच्चे मुसीबत में हैं”
भारत मे अधिकतर वृद्ध महिला किसानों के लिए जमीनों के मालिकाना हक का मुद्दा वित्तीय मुद्दे से कहीं अलग है। उनके लिए जमीन पूजनीय होती है व इसका मालिकाना सदियों से चली आ रही उनकी परम्परा और संस्कृति में निहित एक वंशानुगत चलने वाला मामला है। 
बलजीत पूछती है, “हमारी आने वाली पीढ़ियाँ क्या कहेंगी कि हमने अपनी आवाज नहीं उठायी? यही कारण है कि हम सड़कों पर बैठे हैं ताकि अपने आने वाले बच्चों (पौत्रों) के लिए अपनी जमीनों को बचा सकें।”
ये आगे की सोच वाली मानसिकता टिकरी और सिंघू दोनों बॉर्डर पर बैठी वृद्ध महिलाओं के बीच एक आम सोच है। 
58 साल की जसपाल कौर टिकरी बॉर्डर पर दो अन्य महिला प्रदर्शनकारियों के साथ एक मैदान में बैठी हैं। वह कहती हैं, “भगत सिंह जैसे शहीदों की याद को जिन्दा रखने के लिए” उन्होंने और उनके एक साथी ने एक जैसा बसन्ती दुपट्टा (पीला स्कार्फ) ओढ़ रखा है। 
जसपाल अपने पति के साथ पंजाब से टिकरी तक आयीं क्योंकि उनका मानना है कि ये कानून आने वाली पीढ़ियों के लिए हानिकारक हैं, वह इन्हें अपने बाप–दादाओं की कड़ी मेहनत की कमाई छीनने का जरिया बताती हैं। वह कहती हैं, “यह जीवन जीने का कोई अर्थ नहीं यदि हमारे बच्चे मुसीबत में हैं।”
उनके कहे शब्दों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है यदि हम इस बात पर नजर डालें कि खराब परिस्थितियों व खेती के कारण लिए गए कर्ज के चलते 2019 में 10000 से भी अधिक भारतीयों किसानों ने आत्महत्या करी। 
जसपाल बिना लड़खड़ाए बुलन्द आवाज में कहती हैं, “हम पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ते रहेंगे। हमें अपने सामने आयी हर मुसीबत को झेलना है।”
वे कहती हैं कि सभी किसान एकजुट हैं और जब एक दूसरे का साथ देने वाली संस्कृति बनती है तो सर्दी के इन महीनों में जान पड़ जाती है। 
सामूहिक रसोई और निस्वार्थ सेवा
विरोध–स्थलों पर एक सामुदायिक सक्रियता बनी हुई है क्योंकि वहाँ महिलाएँ और पुरुष क्रान्तिकारी गीत गाते हैं, नाचते हैं व नुक्कड़ नाटक करते हैं। 
33 साल की जस्सी सांघा, एक फिल्म निर्माता जो दिल्ली में चल रहे विरोध–प्रदर्शनों का लिखित दस्तावेज तैयार कर रही हैं खुद को “किसानों की स्वाभिमानी बेटी” बताती हैं। एक गीत में वह लिखती हैं कि महिलाएँ यह उद्घोष कर रही हैं: “ये महिलाएँ यहाँ राज्य से लड़ने आयी हैं, इसलिए तुम्हें इन महिलाओं की हिम्मतपरस्ती को सलाम करना होगा और इन्हें इनके अधिकार देने होंगे।”
सिक्खों की निस्वार्थ सेवा करने की प्रथा के आधार पर बहुत से विरोध–स्थलों पर लंगर (निशुल्क सामुदायिक रसोई) की व्यवस्था की गयी है। जस्सी बताती हैं, “हफ्तों से प्रदर्शनकारी इतना अधिक राशन ला रहे हैं कि वहाँ के स्थानीय लोग भी हमारे लंगर से ही खाना खाते हैं।”
पंजाब की एक अभिनेत्री व सामाजिक कार्यकर्ता सोनिया मान भी किसानों के साथ विरोध–प्रदर्शन में आयीं। वह कहती हैं, “मैं एक किसान की बेटी हूँ। मेरे पिता एक यूनियन लीडर थे और उन्होंने किसानों की खातिर अपनी जिन्दगी कुर्बान कर दी, यही कारण है कि मैं यहाँ हूँ।”
30 साल की सोनिया को साफ तौर पर पर यह स्पष्ट है कि ये कानून भूमिहीन महिला किसानों के साथ–साथ छोटे किसानों के लिए भी कितने अधिक हानिकारक साबित होंगे: “सभी बड़ी–बड़ी कम्पनियाँ हमारी जमीनों को हथियाना चाहती हैं और वहाँ अपने–अपने कॉरपोरेट हाउसेज खोलना चाहती हैं। इस प्रकार, वे पंजाब को खत्म करना चाहती हैं।”
जब से पंजाब में आन्दोलन शुरू हुआ है, प्रदर्शनकारियों का यही सन्देश है कि यह इस प्रकार का मुद्दा नहीं जो केवल पंजाब तक सीमित हो बल्कि ऐसा है जो सभी किसानों को प्रभावित करता है और इसके नतीजें भी देशव्यापी होंगे। इन प्रदर्शनकारियों के लिए, यह एक ऐसी लड़ाई है जो धर्म और राज्य से बढ़कर है। 
सोनिया कहती हैं, “हरियाणा, राजस्थान व अन्य राज्यों के किसान इस आन्दोलन में शामिल हैं। वे साथ आते हैं और साथ ही फैसलें लेते हैं। वे सभी का सम्मान करते हैं। वहाँ हमेशा हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख सभी रहते हैं और हर कोई यहाँ आता है।”
आँसू गैस के गोले व पानी की बौछारें
भारत में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बयान व भाषण, विरोध करने वाले किसानों को ‘देशद्रोही’ होने का तमगा दे रहे हैं और कुछ तो उनको आतंकवादी तक कहने में नहीं झिझक रहे। 
सोनिया कहती हैं, “वे हमारे आन्दोलन को केवल नुकसान पहुँचाना चाहते हैं।” वह यह पक्के तौर पर मानती हैं कि सरकार और मीडिया इस आन्दोलन के उद्देश्य को धार्मिक और राष्ट्र–विरोधी करार देकर इसका दुष्प्रचार करने का प्रयास कर रही है। 
वैसे तो प्रदर्शनकारी इस बात से बेहद क्रोधित और अपनी बात पर अड़िग हैं, पर साथ ही सतर्क और धैर्यशील भी हैं और इस बात के लिए तो वे खास तौर से चैकन्ने रहते हैं कि अपनी ओर से उन्हें किस व्यक्ति को बात रखने की अनुमति देनी चाहिए। वे कहते हैं कि खालिस्तान (एक सिक्ख अलगाववादी आन्दोलन) का जरा भी कोई जिक्र उनके उद्देश्य को बहुत बुरी तरह प्रभावित कर देगा और मीडिया व सरकार को आन्दोलन का दुष्प्रचार करने का अवसर भी प्रदान करेगा।
निकिता जैन, एक पत्रकार जो जमीनी स्तर पर आन्दोलन से सम्बन्धित खबरों को कवर कर रही हैं, कहती हैं, “कुछेक लोगों के मत इस आन्दोलन को राष्ट्र–विरोधी नहीं बनाते और न ही किसानों को गलत साबित कर सकते हैं।” वह इन आरोपों की विडम्बना की ओर इशारा करती हुई कहती हैं, “जो अपने देश के हित के लिए सबसे अधिक कार्य करता है, आप उस अन्नदाता को देशद्रोही कैसे कह सकते हैं?”
जैन इस बात पर जोर देती हैं कि आन्दोलन कितना शान्तिपूर्ण है और यह कितनी अन्यायपूर्ण बात है कि किसानों द्वारा इतनी नरमी दिखायी जाने के बावजूद भी उनके साथ इतना बुरा बर्ताव किया जा रहा है। वह कहती हैं, “मन को उल्लास से भरता वहाँ का माहौल/संगीत बेहद खूबसूरत है।”
इन सब के बाद भी, शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर जिनमें बुजुर्ग प्रदर्शनकारी भी शामिल थे आँसू गैस के गोले व पानी की बौछारें छोड़ी गयीं। जस्सी कहती हैं, “भारत देश जो पूरी दुनिया मे सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जाना जाता है वहाँ इन शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान जो कुछ भी हो रहा है वह पूर्ण रूप से मानव अधिकारों का उल्लंघन है।”
26 नवम्बर को निकिता जैन ने जो देखा वह बताती हैं, जब प्रदर्शनकारियों ने शान्तिपूर्वक दिल्ली में प्रवेश करने की कोशिश की तब पुलिस द्वारा उनके साथ अत्यन्त बर्बरतापूर्ण बर्ताव किया गया। वह ये तर्क देती हैं, “जनता को अपने हक के लिए विरोध करने का अधिकार है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार उनका दमन करने लगे।”
“हमारे घुटने उनकी गर्दनों पर टिके हुए हैं” (यानि उनको किसी भी हालत में इन कानूनों को वापस लेना ही होगा)
पुलिस के अनुसार, प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों की खराब परिस्थितियों के चलते दिल का दौरा, हाइपोथर्मिया व सड़क दुर्घटना के कारण कम से कम 25 मौतें हो चुकी हैं।
अधिकतर लोग जमीनों पर या फिर ट्रकों के पीछे वाले हिस्से में सोते हैं और शौचालयों के इस्तेमाल के लिए वहाँ के स्थानीय लोगों की मदद पर निर्भर हैं या फिर खुले में ही जाने को मजबूर है जहाँ किसी तरह की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। लेकिन इन सबके बाद भी महिला किसान अपने संकल्प से विचलित नहीं हुई हैं अथवा डरी नहीं हैं। 
कानूनों की वापसी पर कोई आपसी समझौता न होने के बाद किसानों के यूनियन लीडर व सरकारी अधिकारियों के बीच होने वाली छठे दौर की वार्ता  को पिछले हफ्ते रद्द कर दिया गया। वे कहते हैं कि इसके बावजूद भी किसानों की माँगें लगातार दिल्ली की सीमाओं पर कोहराम मचाए हुए हैं और उनके इरादे मजबूत हैं। 
बलजीत और जसपाल की अलजजीरा से हुई बातचीत के एक दिन पहले वहाँ बारिश हुई थी, लेकिन किसी भी महिला ने ठण्ड या असुविधा होने की शिकायत नहीं की।
सरकार व किसानों की बातचीत के बीच चल रहे अवरोधों के बावजूद भी महिला किसानों ने वहीं डेरा डाल लिया है और जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं होती तब तक वहीं इंतजार करने के लिए खुद को तैयार कर लिया है। 

परमिन्दर और कुलविन्दर दोनों ही बहुत बहादुर महिलाएँ हैं। परमिन्दर जिनकी आवाज दृढ़ व चेहरा निर्भीक है कहती हैं, “जब से यह आन्दोलन शुरू हुआ है हम तभी से यहाँ है और यहीं रहेंगे। हमें यहाँ कोई समस्या नहीं है, हमें अपने घरों की याद भी नहीं आ रही है।”
जैसा कि कुलविन्दर बताती हैं कि महिलाओं को अपने–अपने घरों से प्रोत्साहन मिल रहा है। वे हमें फोन करते हैं और कहते हैं, “डटे रहो, हार मत मानना।”
जब उनसे यह पूछा गया कि उनकी की जा रही कोशिशें सफल होंगी भी या नहीं, तो परमिन्दर और कुलविन्दर दोनों ही इस से सहमत थी और चुनौती भरे शब्दों में उन्होंने कहा, “वे इन कानूनों को वापस क्यों नहीं लेंगे जब हमारे घुटने उनकी गर्दनों पर टिके हुए हैं यानि उनको किसी भी हालत में इन कानूनों को वापस लेना ही होगा।”
जस्सी बोलती हैं कि किस प्रकार भारत में भूमि ही किसानों की माँ है, और यहाँ की माताएँ, बहनें और बेटियाँ इस आन्दोलन का एक मजबूत आधार बनी हुई हैं। 
किसानों का यह आन्दोलन अभी जारी रहने वाला है। जैसा कि बलजीत कहती हैं, “हमनें अपने अधिकारों के लिए अपनी आवाज उठायी है और अपने अधिकारों को पाकर ही रहेंगे।”
–सन्नी शेरगिल
(साभार अलजजीरा, अनुवाद– रुचि मित्तल)

Friday, March 12, 2021

महिलाओं ने बदल दिया किसान आन्दोलन का स्वरूप




इस समय दिल्ली भारतीय किसानों की लम्बे समय से चली आ रही उथल–पुथल और दबी हुई तड़प की अभूतपूर्व हलचल का गवाह बन रही है। एनडीए सरकार द्वारा तीन कृषि कानूनों के खिलाफ अगस्त 2020 में शुरू हुआ विरोध, इस 25 नवम्बर के बाद से अपनी ताकत और बहादुरी का भरपूर प्रदर्शन करने के लिए तत्पर पंजाब और हरियाणा के किसानों ने ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। 2–3 लाख किसानों की मौजूदगी के कारण ही यह आन्दोलन अनोखा नहीं है, जिसमें कड़कती ठंड में किसान बैठे हैं, बल्कि इस आन्दोलन ने पीढ़ियों से चले आ रहे धर्म, जाति, पेशे और लैंगिक भेदभाव को भी किसी हद तक मिटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जैसा कि अक्सर इस किस्म के मामलों में होता है, यह विरोध भी पहले पहल पुरुष किसानों ने अपनी जमीन और पैदावार को कॉरपोरेट के हाथों में जाने से बचाने के लिए शुरू किया, जैसे–जैसे सप्ताह और महीने बीतते गए, घर पर बैठी महिलाओं ने महसूस किया कि विरोध स्थलों पर जाकर, हजारों की संख्या में उपस्थिति दिखा कर आन्दोलन की एकजुटता को बढ़ाने का समय आ गया है। उनकी यह उपस्थिति कई कारणों से उल्लेखनीय है।
पहला तो यह कि यह मुख्यधारा के उस मिथक को चूर–चूर करता है कि भारतीय ग्रामीण स्त्रियाँ अपनी अस्मिता को स्वीकारने में असमर्थ हैं, और उनका अस्तित्व उनके आसपास के पुरुषों के आदेश से जुड़ा हुआ है। कई महिलाएँ या तो व्यक्तिगत किसानों के रूप में या विशेष किसान संघ के सदस्य के रूप में दिल्ली के सिंघु बॉर्डर या टिकरी बॉर्डर पर जा पहुँची हैं, वे अपनी सामूहिक और सामाजिक राजनीतिक चेतना का जबरदस्त प्रदर्शन कर रही हैं। उन्हें यकीन है कि एक सिंगल फोन कॉल मात्र पर ही उनकी घरों में ही रुकी हुई बहनें उन सबके लिए पर्याप्त भोजन और कपड़े मुहैय्या कर देंगी।
दूसरे, यह उस पूर्वाग्रह से ग्रसित धारणा को खारिज करता है कि महिलाएँ चाहे वह किसान हों या गृहिणी इन नये तथाकथित कृषि सुधारों की पेचीदगियों या प्रभावों से अनजान हैं, क्योंकि वे अनपढ़ हो सकती हैं या सरकार के इरादों से अनभिज्ञ हो सकती हैं। विरोध स्थल पर महिलाओं के साथ एक सार्थक बातचीत से आसानी से पता चलता है कि वे जानती हैं कि वे क्या और क्यों लड़ रहे हैं, जैसे अरुणा जो हरियाणा के सोनीपत की एक छात्रा है और हरमीत कौर जो एक गृहिणी हैं, नये आवश्यक वस्तु अधिनियम से पूरी तरह वाकिफ हैं, साथ ही किसानों द्वारा एमएसपी हटाने के लिए या अनुबन्ध खेती की ओर ले जाने वाले प्रावधानों से भी। वे जानती हैं कि ये कानून उनकी कृषि भूमि को हमेशा के लिए हथियाने के लिए बनाए गए हैं, जो उनकी भावी पीढ़ियों को उनके अधिकारों से वंचित कर देंगे, और उन्हें अडानी और अंबानी का मोहताज बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।  
आन्दोलन में औरतों की विशेष भूमिका को अति उल्लेखनीय बनाने वाला तीसरा कारण यह है कि वह लिंग आधारित मापदण्डों और पितृसत्ता की उस कांच की छत को तोड़ता है जो उनके सम्पूर्ण जीवन को निर्धारित करता है। पारम्परिक धारणा के अनुसार उनका नियत स्थान घर की चहारदीवारी के भीतर है जहाँ सिर्फ चूल्हा–चैका करना ही उनका काम है, ये धारणा तब तोड़ी जाती हैं जब ये औरतें हाथों में विरोध के झण्डे लिए हुए – एकता और धैर्य के गीत गाते हुए आगे बढ़ती हैं। वे शाहीन बाग की उन बहादुर महिलाओं से प्रेरणा लेती हैं, जिन्होंने दिल्ली की पिछली सर्दियों के दौरान भारत सरकार के नागरिकता संशोधन अधिनियम के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर (नागरिक रजिस्टर सीएए, एनआरसी)  के खिलाफ विरोध का चेहरा बन गर्इं थीं। वहाँ बयासी साल की बिलकिस दादी एक चेहरा थीं, यहाँ भी मोहिन्दर कौर और जांगिड़ कौर जैसी नानियाँ हैं, जो नारीवाद के नये पैमाने स्थापित कर रही हैं।
आखिर में, अपने हमराह पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ये महिलाएँ जो रास्ते तय कर रही हैं वह संवाद और लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करेगा। भारत के सिकुड़ते और सड़ते हुए राजनीतिक परिदृश्य में ये महिलाएँ  ताजा हवा की बयार लेकर आयी हैं, इस सच की अनदेखी करना सम्भव नहीं। उन्होंने अपने  प्रतिरोध में निहायत जरूरी चीजों जैसे सहानुभूति, इनसानियत तथा विश्वास का सम्मिश्रण किया है! 
तभी तो आँखों में अद्भुत चमक लिए हुए तेज तर्रार नानियाँ बताती हैं कि या तो वो सरकार को बिल वापिस लेने के लिए बाध्य कर, विजय प्राप्त करेंगी या फिर अपनी आखिरी सांस तक लड़ेंगी।
यह जानना सुखद है कि ये महिलाएँ किसी भी किस्म के दुर्भावना पूर्ण प्रचार को खत्म करने में सक्षम हैं तथा आन्दोलन को गति देने और बनाए रखने के लिए ये राजनीतिक अभिनेता के रूप में खुद को शुमार करती हैं।
–लक्ष्मी सुजाता
(काउण्टर करण्ट से साभार, अनुवाद– ऊषा नौडियाल)

Friday, March 5, 2021

पीड़ा में कैद पिछला साल गुजर गया



हमारा देश एक अभूतपूर्व बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पूरे देश में उथल–पुथल मची हुई है। पिछला साल कोविड और कष्टपूर्ण लॉकडाउन में बीता जिससे कोई भी समुदाय अछूता नहीं रहा। लॉकडाउन के साथ ही शुरू हुए मजदूरों के महापलायन की पीड़ादायी छवियाँ अभी हम भूले नहीं हैं। लॉकडाउन के चलते मजदूरों ने अपने काम की जगह से अपने घरों तक हजारों मील का सफर पैदल ही पूरा किया। उस यात्रा में सभी को कष्ट हुआ पर सबसे ज्यादा कष्ट सहा अपनी उजड़ी गृहस्थी को सर पर ढोती, बच्चों को गोद में सम्भालती महिलाओं ने। गर्भवती महिलाओं ने भी सैकड़ों मील की यात्रा पैदल पूरी की। कई महिलाओं ने रास्ते में ही शिशु को जन्म दिया और फिर दूसरे दिन अज्ञात भविष्य की ओर चल पड़ीं।
लॉकडाउन के कारण पूरी दुनिया घरों में कैद हो गयी। यह कैद औरतों पर बहुत भारी पड़ी। इस बीच भारत ही नहीं सारी दुनिया में औरतों पर घरेलू हिंसा और अत्याचार में भयानक वृद्धि हुई। पहले से ही कैद औरत और अधिक गुलामी में बँध गयी। उसका बचा–खुचा निजी ‘स्पेस’ भी जाता रहा। दूसरी ओर ‘वर्क फ्रॉम होम’ के कारण औरतों पर काम का बोझ दोगुना हो गया। लॉकडाउन के कारण जिन हजारों महिलाओं को अपने काम से हाथ धोना पड़ा उनके कष्टों का तो कोई हिसाब ही नहीं है।
बीते वर्ष बलात्कारियों को राजनीतिक संरक्षण देने की संस्कृति और स्पष्ट और निर्लज्ज रूप से स्थापित हो गयी। उन्नाव से लेकर हाथरस की घटनाओं में इसे साफ तौर पर देखा जा सकता है।
इस बीच अलग–अलग स्तरों और रूपों में लड़कियों और औरतों पर पितृसत्तात्मक शोषण और अत्याचार बदस्तूर जारी रहा, लेकिन तमाम अवसरों पर वह प्रतिकार करती भी दिखीं, कहीं अकेले–अकेले तो कहीं संगठित होकर। लेकिन हाल–फिलहाल जिन महिलाओं ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया का ध्यान अपनी और खींचा है, वे हैं किसान औरतें जो किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर किसान आन्दोलन के हर मोर्चे पर अपनी मौजूदगी से न सिर्फ आन्दोलन को ताकत दे रही हैं, बल्कि अपने किसान होने के उस दावे को भी प्रस्तुत कर रही हैं जो उन्हें समाज ने नहीं दिया। जिस तरह से महिलाएँ खेती की रीढ़ हैं उसी तरह से वे किसान आन्दोलन की भी रीढ़ हैं। उनकी भारी मौजूदगी ने आन्दोलन को पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश के घर–घर में पहुँचा दिया है। और अब इसका दायरा राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक तक बढ़ गया है और बढ़ता ही जा रहा है।
किसान आन्दोलन में महिला किसानों की भागीदारी से आन्दोलन का स्वरूप ही बदल गया है। वह अधिक मानवीय, रचनात्मक, अनुशासित और गम्भीर हो गया है। उनकी अभूतपूर्व भागीदारी ने इस आन्दोलन को पहले के आन्दोलन से बिलकुल भिन्न रूप दिया है, उसकी जड़ें मजबूत की है और उसे लम्बे समय तक चलाने की ताकत दी है। इसमें शामिल लड़कियों और महिलाओं ने महीनों तक चले धरनों को संयोजित और अनुशासित बना दिया है। इस आन्दोलन में शामिल सभी को एक परिवार बना दिया है। उनकी सक्रिय मौजूदगी से उसमें शामिल नौजवान भी गम्भीर, अनुशासित और अधिक मानवीय हो गये हैं, यहाँ तक कि लोगों की भाषा बदल गयी है। इसने आन्दोलन की एक नयी संस्कृति, ‘सबको, बच्चे, बूढ़े, किशोर, नौजवान, सबको साथ लेकर’ चलने की संस्कृति को जन्म दिया है। यह सारे प्रभाव इतने ताकतवर हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया तक का ध्यान उन पर गया है।
दिल्ली के सिंघू, टीकरी बॉर्डर पर जो महिलाएँ महीनों से बैठी हैं वास्तव में वे सितम्बर 2020 से तीन कृषि कानून के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करा रही हैं। वे किसान मोर्चा के झंडे तले संगठित थीं और इससे पहले भी रेल रोको कार्यक्रम और धरने के माध्यम से अपना विरोध जता रही थीं। पंजाब से जो महिलाएँ अपना घर–परिवार लेकर दिल्ली धरने पर आ पहुँची हैं उन्होंने बीते वर्ष बर्बाद होती खेती के कारण बहुत कुछ खोया है। अपने परिवार को कर्ज के जाल में फँसते देखा है और बहुतों ने अपने की आत्महत्या की पीड़ा भी सही है। इसीलिए वे सिर्फ किसी के बुलाने पर नहीं आयी हैं बल्कि खुद सोच–समझकर, होशो–हवास में अपना विरोध दर्ज करने और अपना हिसाब माँगने आई हैं। वे जानती हैं कि फसल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म होने, खेती को ठेके पर देने और दाल, चावल,आलू जैसी अनिवार्य कृषि उपज को ‘अनिवार्य वास्तु कानून, की सुरक्षा से बाहर कर देने जैसी खतरनाक बातों वाला कृषि कानून यदि लागू हो गया तो वे भी बर्बाद होंगी, उनका परिवार बर्बाद होगा। वे समझ रही हैं कि पिछले 20–25 सालों में खेती का बाजारीकरण हुआ है, बीज, बिजली, डीजल, खाद पहुँच के बाहर हो गए हैं, फसलों का सही दाम तो शायद ही मिला हो। इसीलिए धरना स्थल पर जाने वाले पत्रकारों के सवालों का वे पूरे आत्मविश्वास और तथ्यों के साथ जवाब दे रही हैं। वास्तव में उनकी लड़ाई एक ऐतिहासिक सामाजिक और आर्थिक लड़ाई है जो सभी औरतों को साहस के साथ जीने और अपने हकों के लिए दावा करने का रास्ता दिखा रही है।
इतिहास बताता है कि कोई भी संघर्ष खाली नही जाता। संघर्ष हार कर भी हारता नहीं, वह हमेशा एक और नये संघर्ष की जमीन तैयार कर देता है। इन किसान औरतों का किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ना महिला आन्दोलन के लिए एक निर्णायक मोड़ है। इससे उनमें शामिल महिलाएँ ही मजबूत नहीं हुई हैं बल्कि दूर खड़ी औरतों और लड़कियों को भी इससे ताकत मिली है, लड़ने का तरीका मिला है, बदलाव और भावी जीत में विश्वास पैदा हुआ है।

Thursday, December 24, 2020

लव-जिहाद कानून:एक विश्लेषण



लव जिहाद- पिछले चार-पांच सालों से यह शब्द खूब चर्चाओं में रहा है। लव यानी कि प्यार और जिहाद जिसका मतलब इतिहास में ‘धर्म युद्ध’ बताया गया है। दोनों ही शब्द आपस में मेल नहीं खाते। प्यार बहुत ही सरल, साधारण और प्राकृतिक मानवीय भाव है। जहां लव हो वहां जिहाद नहीं हो सकता और जहां जिहाद हो वहां प्यार नहीं हो सकता।
हाल ही में उत्तर प्रदेश में लव जिहाद का अध्यादेश प्रभावी हो गया है। राज्यपाल ने गैरकानूनी तरीके से धर्मांतरण पर रोक से जुड़े अध्यादेश को मंजूरी दे दी। इससे पहले मध्य प्रदेश सरकार लव जिहाद पर कानून लाने की तैयारी कर चुकी है। हरियाणा, कर्नाटक और कई अन्य बीजेपी शासित राज्यों में भी लव जिहाद पर कानून लाने की कवायद चल रही है। कानून के मुताबिक, जबरदस्ती प्रलोभन से किया गया धर्म परिवर्तन संज्ञेय और गैर जमानती अपराध होगा। इस कानून को तोड़ने पर कम से कम ₹रु 15,000 जुर्माना और 1 से 5 साल तक की सजा होगी। यही काम नाबालिक या अनुसूचित जाति, जनजाति की लड़की के साथ करने में ₹रु 50,000 जुर्माना और 3 से 10 साल तक की सजा होगी। धर्म परिवर्तन के लिए तयशुदा फॉर्म भर कर दो महीने पहले जिला अधिकारी को देना होगा।

नए कानून के मुताबिक आपको साबित करना होगा कि आपका रिश्ता जबरन धर्म परिवर्तन या किसी प्रलोभन के तहत नहीं है। जब तक यह साबित होगा तब तक क्या लड़का-लड़की सुरक्षित होंगे? उनकी जान को कोई खतरा नहीं होगा, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? लोग उन्हें चरित्र का सर्टिफिकेट नहीं देंगे इसकी क्या गारंटी होगी? इस जांच के दौरान कभी न भरने वाली जो मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक चोट पहुंचेगी उसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या किसी को पसंद करना और अपने हिसाब से जिंदगी बिताना कोई पाप है? क्या धर्म इतना कमजोर होता है कि शादी करने से खतरे में पड़ जाता है? 

यदि हम अपने आसपास मौजूद जोड़ों जो दो अलग-अलग धर्म से वास्ता रखते हों, के वैवाहिक जीवन को देखने की कोशिश करें तो हम पायेंगे कि उनका जीवन आमतौर पर अच्छा ही चल रहा होता है। दोनों के परिवारों द्वारा देर सबेर वे स्वीकार ही कर लिए जाते है और मिलकर खुशनुमा जीवन जी रहे होते हैं। उनके जीवन में संकट और मुसीबत तब आने लगती है जब बाहर से कोई पार्टी, समुदाय या कोई संगठन निजी, धार्मिक या चुनावी स्वार्थ के लिए उनके जीवन में  गैर-जरूरी हस्तक्षेप करने लगे और अचानक किसी एक धर्म पर आये संकट के रूप में उसे प्रस्तुत करने लगे।    

भारत सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई विविधताओं से भरा देश है। हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान लिखने से पहले सारे पहलुओं के बारे में सोच समझकर ही संविधान रचा। हमारा संविधान हमें अपनी पसंद से रहने, कहीं भी बसने, नौकरी करने, जीवनसाथी चुनने और यहां तक कि धर्म चुनने या छोड़ने का अधिकार भी देता है। इसमें दो अलग-अलग धर्मों की शादी के लिए ‘स्पेशल मैरिज एक्ट’ का प्रावधान भी दिया गया है। ऐसे में इस नए कानून की जरूरत है भी या ये सिर्फ नफरत के शतरंज को जीतने का एक मोहरा भर है।

भारत में तो सदियों से विभिन्न नस्लें और विभिन्न धर्मों के लोग आकर बसते रहे हैं। भारत की धरती और हमारे पुरखों ने बाहें फैलाकर उन्हें अपनाया है। हमारा संविधान एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करता है, जिसमें राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता, राज्य धार्मिक मामलों से अलग रहता है और धर्म नागरिकों का निजी मसला माना जाता है। हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है। ऐसे में यह कानून न सिर्फ व्यक्ति के धार्मिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि राज्य के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर भी चोट करता है।

लव जिहाद कानून का सबसे पहला केस जो सामने आया है वह है पिंकी और राशिद का। पिंकी और राशिद देहरादून में नौकरी करते थे, दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे। पिंकी ने शादी का प्रस्ताव रखा और दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद पिंकी ने इस्लाम को अपना लिया और अपनी इच्छा से नाम बदलकर मुस्कान रख लिया। कुछ दिनों बाद उन दोनों को धमकी भरे फोन आने लगे जिसमे उन्हें अलग करने से मौत तक कि धमकी शामिल थी। मुस्कान ने देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को मदद के लिए पत्र लिखा और मदद की मांग की। 
कोरोना के चलते दोनों के ऑफिस बंद हो गए तो फिर वे लौटकर राशिद के गांव मुरादाबाद आ गए। थोड़े दिन बाद मुस्कान को पता चला कि वो मां बनने वाली है। दोनों अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने के लिए अपनी शादी रजिस्टर करवाने कोर्ट में गए और वापसी में बजरंग दल के सदस्यों ने उन्हें रोक लिया। उन्होंने पूछताछ करने के बाद नए कानून के तहत दोनों को थाने ले जाकर पुलिस के हवाले कर दिया।
मुस्कान गिडगिडाती रही कि वह मां बनने वाली है मगर उसकी एक न सुनी गई। राशिद और उसके भाई को जेल में डाल दिया गया, वही मुस्कान को जबरदस्ती नारी निकेतन में भेज दिया गया। नारी निकेतन के बारे में वह कहती है कि वह किसी जेल से कम नहीं था। वहां ऊंची-ऊंची दीवारें हैं ताकि बाहर का कुछ भी दिखाई ना दे और दीवारों में चारों ओर से तार की बाड़ थी। उस नारी निकेतन में मुस्कान के अलावा 35-40 और लड़कियां थी। दो दिन वहां रहने के बाद उसे पेट में दर्द महसूस हुआ तो उसे हॉस्पिटल ले जाया गया। वहां उसे बिना किसी जानकारी के दवाई और इंजेक्शन दिए जाने लगे। मुस्कान का गर्भ 3 महीने का था अब तक उसे कोई परेशानी नहीं हुई थी, अचानक उसको खून बहने लगा। मुस्कान ने अपना बच्चा खो दिया था। उसे न कुछ बताया गया और न ही कोई रिपोर्ट दी गयी। एक इंटरव्यू में मुस्कान ने बताया कि उसका जबरन गर्भपात करवाया गया है।

धारा 312, 313 और 315 के मुताबिक यदि कोई भी व्यक्ति मां की अनुमति के बिना उसका गर्भपात करवाता है या बच्चे को कोख में ही मारने की कोशिश करता है तो संबंधित व्यक्ति को दंडित किया जाएगा। मुस्कान गिडगिडाती रही कि उसके बच्चे को मारा गया है लेकिन इस बात पर उत्तर प्रदेश सरकार ने कोई संज्ञान नहीं लिया। जिस समाज में हजारों बलात्कारों को आसानी से हज़म कर दिया जाता है वहां इनसे एक प्रेम विवाह हज़म नहीं होता है।

भारत जैसे आजाद देश में जहां आजादी के लिए इतने बलिदान दिए गए हो, लड़कर अपना हक, आजादी, बराबरी, सम्मान और फैसले लेने का मौलिक अधिकार हासिल किया गया हो वहां अपने इतिहास को ठुकरा कर दोबारा से गुलामी और सामंतवादी वक्त में हमें लौटाया जा रहा है। इन सभी लोगों को इतिहास उठा कर पढ़ लेना चाहिए जो दूसरों के मसीहा बनते हैं और खुद को पूरे भारत के केयरटेकर समझते हैं। हमारे इतिहास में औरतों ने आजादी की लड़ाई में बराबर साथ दिया है। भारतवर्ष के निर्माण में उनकी भी पूरी भागीदारी है। देश में जितना हक एक पुरुष का है उतना ही एक महिला का भी है। ऐसे में किसी पुरुष को किसी महिला के फैसले लेने का कोई अधिकार नहीं है।

नए कानून के समर्थन में लोग कहते हैं कि ये हिंदू लड़कियों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। ऐसे में कोई उन्हें बेवकूफ नहीं बना पाएगा। सवाल ये है कि क्या हिंदू लड़कियां इतनी बेवकूफ है कि 2020 में भी अपने फैसले खुद नहीं ले सकती हैं? क्या उनके मां-बाप ने उन्हें समझदार नहीं बनने दिया? क्या उनके पालन-पोषण में कोई कमी रह गई? क्या उनके दिमाग का विकास नहीं हो पाया है? क्या वे अब भी गुलाम है? क्या वो आपके हाथों की कठपुतलियां हैं? इन प्रश्नों का जवाब सिर्फ यही हो सकता है – नहीं।
-शालिनी