Sunday, September 1, 2019

स्त्री “तीन कविताये”


स्त्री “तीन कविताये”
.
१. 
नदिया रोती है 
पत्थरो की ओट में 
मैपलो के बीच कही 
कोई पतझड़ रोता है ......
एक स्त्री रोती है 
परदेश गये 
बेटे और पति के लिये,
भूखे बच्चो के लिये,
स्त्री के आंसू भी 
उसके अपने नही होते .



स्त्री 
आकाशगंगा की तरह
समेट लेती है 
ग्रह नक्षत्रो को
अपने आँचल में
और  पृथ्वी की तरह 
हमारी परिक्रमा करती हैं ....
वह प्रेम करती है 
पूरी निश्छलता से
पूरे समर्पण से 
जैसे लहरे करती है
चंद्रमा से प्रेम ....


३.
.
स्त्री रोती है
तो बनते है लोकगीत
हँसती है 
तो बनते है शगुन आखर
विद्रोह करती है स्त्री 
तो इतिहास बनते हैं 
सीपियों के मोती है 
स्त्रियों के रहस्य 
और जीवन 
स्त्री का चेहरा है


Poet of mountains

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