सामन्ती समाज के विधि - निषेध की जकड़ कुछ ढ़ीली जरुर हुई है, लेकिन आज भी हमारी जिंदगी पर उसका काफी असर मौजूद है. इसके साथ ही पूँजीवाद के नृशंस हमले नित नए रूपों में सामने आ रहे हैं. पुरुष वर्चस्व के जर्जर रूप ख़त्म नहीं हुए बल्कि पश्चिम की विषैली दवाओं के साथ मिलकर इनका स्वरुप पहले से भी अधिक बर्बर और जघन्य हो गया है. फर्क इतना ही है कि पहले जो क्रूरता नंगे और भौड़े रूप में सामने आती थी , आज वह सूक्ष्म, जटिल और परिष्कृत रूप ले चुकी हैं. स्त्री - भ्रूण हत्या इसका स्पष्ट प्रमाण है, जहाँ पुत्र कि लालसा में या दहेज़ बचाने के लिए बेटियों को पैदा होने से पहले, गर्भ में ही मार दिया जा रहा है. इसके लिए अल्ट्रासाउंड और अन्य नयी वैज्ञानिक तकनीकों और विधियों का इस्तेमाल किया जा रहा है. अब हत्यारे ' शिक्षित ', 'सुसंस्कृत ' चिकित्सक होते हैं, पुराने ज़माने की अनपढ़ - गँवार दाइयां नहीं.
वैसे तो नारी समुदाय के खिलाफ हिंसा और क्रूरता के इतने रूप हैं, जिनकी गिनती करवाना सम्भव नहीं. मान -मर्यादा के नाम पर हत्या, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर हिंसा, दहेज़ हत्या, कन्या- भ्रूण हत्या, बलात्कार, देह व्यापार, पुलिस द्वारा यंत्रणा, युद्ध और अशांत क्षेत्रों में तबाही, आतंकी और राज्य आतंकी हिंसा, भूख - कुपोषण - रोग से अकाल मौत, विकास के नाम पर विस्थापन और उत्पीडन, असंगठित क्षेत्र में खटते - खटते मर जाना , सांप्रदायिक, जातिवादी और नस्ली उन्माद का शिकार बनना, प्रसवकालीन मौत, इलाज बिना मौत ... सूची अन्तहीन है, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा हर साल प्रकाशित होने वाले आंकड़ों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, वही दूसरी ओर पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या खतरनाक हद तक कम होती जा रही है.
पितृसता की सदियों पुरानी जकड़बन्दी के खिलाफ बढ़ती चेतना और प्रतिरोध की प्रतिक्रिया में दमन- उत्पीड़न का तेज होना आश्चर्य नहीं है. महिलाओं पर बढ़ती हिंसा के पीछे यह एक प्रमुख कारण है कि अब वे अन्याय को चुपचाप बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है. यह एक कष्टप्रद किन्तु सकारात्मक तथ्य है.