Friday, December 29, 2023

विज्ञान और प्रौद्यौगिकी के क्षेत्र में महिलाएँ



जब हमारे सामने क्रिकेट से जुड़े किसी भी खिलाड़ी का जिक्र होता है तो हम बिना विचार किए तुरन्त सचिन तेंदुलकर, एमएस धोनी, विराट कोहली या किसी अन्य पुरुष खिलाड़ी का नाम लेते हैंय सम्भव है कि इस सवाल के जवाब में मुट्ठी भर लोग मिताली राज, झूलन गोस्वामी या किसी अन्य महिला खिलाड़ी की भी बात करें। इसी तरह प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की चर्चा करते हुए, हम अक्सर स्टीफेन हॉकिन्स, आइजैक न्यूटन या एपीजे अब्दुल कलाम को याद करते हैं, जबकि विज्ञान के क्षेत्र में जानकी अम्मल, असीमा चटर्जी और अन्ना मणि जैसी कई प्रमुख महिला वैज्ञानिकों ने बड़े–बड़े योगदान दिये हैं। आज के आधुनिक युग में महिलाएँ धरती से लेकर आकाश तक, हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर काम कर रहीं हैं। हालाँकि, उनके इस योगदान को पुरुषों के समान महत्व नहीं दिया जाता है, खासकर उच्च शिक्षा शोध संस्थानों और कार्यस्थलों में। ढेरों चुनौतियों के बावजूद महिला वैज्ञानिकों ने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है, जिसमें इसरो का चन्द्रयान व मंगल मिशन, नासा और नोबेल पुरस्कार शामिल हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं के योगदान के एक मजबूत उदाहरण ने सामाजिक और आर्थिक रूप से गम्भीर मसले का हल निकाला है। यह उदाहरण महिला वैज्ञानिक मैरी क्यूरी के बारे में है, जिन्होंने कैंसर के इलाज में नयी तकनीकों का उपयोग करके कैंसर के लक्षणों को पहचानने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी, जिससे कैंसर के सही पहचान और उपचार की गति में सुधार हुआ। इस क्षेत्र में महिलाओं के योगदान का एक और प्रमुख उदाहरण हैं–– एमरी ई विन्नर, जिन्होंने नैनो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से यन्त्रों का आकार बहुत छोटा करने और नये यन्त्रों का आविष्कार करने में अग्रणी रहीं। एक और प्रमुख महिला वैज्ञानिक हैं, डॉक्टर तेसला मुखर्जी, जिन्होंने कम्प्यूटर साइन्स के क्षेत्र में शानदार छाप छोड़ी। उन्होंने बड़ी संख्या में सिस्टम कोड को व्यवस्थित करने के लिए विशेष तकनीक विकसित की, जिसने कम्प्यूटर साइन्स को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभायी। इन क्षेत्रों में महिलाओं के काम ने, महिलाओं में समानता और आत्मविश्वास की भावना को प्रेरित किया, जिससे उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार भी हुआ। महिलाओं ने इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देकर यह साबित कर दिया कि वे किसी भी क्षेत्र में पुरुषों के साथ बराबरी से चल सकती हैं। 

यूनेस्क इन्स्टीट्यूट फॉर स्टेटिस्टिक्स रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर के शोध संस्थानों में कार्यरत कुल लोगों में 30 प्रतिशत से भी कम महिलाएँ हैं। भारतीय शोध संस्थानों में यह अनुपात और ज्यादा कम हैं। भारत के अनुसन्धान और विकास संस्थानों में 2.8 लाख वैज्ञानिक, इंजीनियर और प्रौद्योगिकीविद् हैं, जिनमें केवल 16 प्रतिशत महिलाएँ हैं। वहीं नेशनल साइन्स फाउन्डेशन की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में एसटीईएम (साइन्स, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमैटिक्स) क्षेत्र में लगभग 43 प्रतिशत महिलाएँ कार्यरत हैं। हालाँकि यूरोस्टाट की रिपोर्ट के अनुसार यूरोप के कुछ देशों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या 50 प्रतिशत से भी अधिक है। 

साल 2020 में किये गये सर्वे से पता चलता है कि भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (इन्सा) के 1,044 सदस्यों में से केवल 89 महिलाएँ थीं, जो कुल संख्या का मात्र नौ प्रतिशत है। वहीं साल 2015 में उनकी संख्या और भी कम थी, जिसमें 884 सदस्यों में मात्र छ: प्रतिशत महिला वैज्ञानिक शामिल थीं। इन्सा के प्रशासनिक निकाय में साल 2020 में 31 सदस्यों में से केवल सात महिलाएँ थीं, जबकि साल 2015 में कोई महिला सदस्य नहीं थी। 

बेशक, आजकल विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी है। भारतीय समाज में महिलाओं की भागीदारी को कम करने वाले मुख्य कारक पितृसत्तात्मक सोच, सामाजिक बाधाएँ और आर्थिक परनिर्भरता हैं। किसी महिला वैज्ञानिक को नौकरी देने या उसे नेतृत्वकारी पद प्रदान करने का निर्णय लेते समय केवल उसकी योग्यता पर ध्यान देने के बजाय उसकी पारिवारिक स्थिति, उसके जीवनसाथी का स्तर जैसे तमाम कारकों पर विचार किया जाता है। वेतन का अन्तर एक बड़ी समस्या है। संस्थानों में महिला कर्मचारी का वेतन पुरुष कर्मचारी के मुकाबले कम होता है। यह असमानता महिला वैज्ञानिकों के लिए आर्थिक और मानसिक तनाव का कारण बनती है। कई बार महिलाओं को उनके साथी पुरुषों की तुलना में कई बाधाओं का सामना भी करना पड़ता है। इसमें पदोन्नति के सीमित अवसर, नौकरी की सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताएँ और परियोजनाओं में समान अवसर न मिलना जैसी बाधाएँ शामिल हैं। 

वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योगों में महिलाओं की संख्या में भारी कमी के कारण प्रबन्धन टीम में और परियोजनाओं में भी उनकी हिस्सेदारी बहुत कम होती है। कुछ मामलों में उन्हें बलात्कार, यौन उत्पीड़न तथा मानसिक उत्पीड़न तक का सामना करना पड़ता है। यह उनके आत्मसम्मान और सुरक्षा पर खतरा होता है, जिससे उनके पेशेवर विकास में दिक्कत आती है। कार्यस्थल में संस्थागत सहायता और सुरक्षा सम्बन्धी व्यवस्थाओं की कमी के कारण गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अपने काम बीच में ही छोड़ देने पड़ते हैं। 

भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक सोच के चलते यह माना जाता है कि किसी भी क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन केवल पुरुषों द्वारा ही किया जा सकता है, क्योंकि उनके पास परिश्रम और विशेषज्ञता का स्तर अधिक होता है। दूसरी ओर महिलाओं को हमेशा घरेलू जिम्मेदारियों के मुनासिब समझा जाता है और उन्हें या तो घर के कामों में लगा दिया जाता है, या फिर ऐसे व्यवसाय में जिसे वह घर के कामों के साथ–साथ आसानी से सम्भाल सकें।

अगर स्कूली शिक्षा की बात करें, तो महिला और बाल विकास मन्त्रालय की एक रिपोर्ट बताती है कि माध्यमिक शिक्षा स्तर पर लड़कियों का औसतन ड्रापआउट (स्कूल छोड़ने की दर) दर 17–3 प्रतिशत और प्राथमिक स्तर पर 4–74 प्रतिशत है। इसका मुख्य कारण यह है कि गाँवों में घरों से स्कूलों की दूरी अधिक होती है, जिस वजह से लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पाती हैं, अगर किसी तरीके से चली भी जाती हैं तो स्कूलों में महिला शिक्षकों के न होने पर या फिर महिला शौचालयों के अभाव में भी स्कूल छोड़ना पड़ता है। देश में सर्वशिक्षा अभियान के तहत बनाये गये प्राथमिक स्कूलों की हालत खराब हो चुकी है क्योंकि सरकारें प्राइवेट शिक्षा को बढ़ावा दे रही हैं। प्राइवेट स्कूलों की भारी–भरकम फीस चुका पाना मेहनत–मजदूरी करने वाले माता–पिता की पहुँच से बाहर है। प्राइवेट संस्थान शिक्षा के नाम पर अपनी जेबें भर रहे हैं। 

कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि महिलाओं ने अपनी मेहनत और आविष्कारों से विज्ञान में अपनी पहचान बनायी है, लेकिन आज की महँगी शिक्षा, देश की बहुतायत जनता की पहुँच से बाहर होती जा रही है, खासकर लड़कियों की, जिससे वह विज्ञान और शिक्षा जैसे कई क्षेत्रों में पीछे होती जा रही हैं।

इस सामाजिक–राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं को दबाकर रखा जाता है, अत: हमें ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है जहाँ महिलाओं और पुरुषों में कोई भेदभाव न हो। यह तभी हो सकता है जब मौजूदा व्यवस्था को बढ़ावा न देकर बराबरी और न्याय पर आधारित व्यवस्था कायम हो। 

–– तसमिया फलक 

Tuesday, December 26, 2023

फिल्म और टीवी जगत की महिलाएँ

 


आज के इस दौर में किताबों, अखबारों और पत्रिकाओं की जगह मोबाइल और टीवी ने ले ली है। जहाँ पहले एक छोटी–से–छोटी बात को देश–विदेश तक पहुँचने में कई दिन लगते थे, वहीं आज हम अपनी बैठक के सोफे पर बैठकर सारी तस्वीरें और जानकारी मिनटों में पा लेते हैं। हम मिनटों में सारी दुनिया से जुड़ जाते हैं। मोबाइल और टीवी में दिखाये जाने वाले अधिकांश कार्यक्रम, धारावाहिक और दूसरी चीजें समाज के अलग–अलग वर्गों पर अलग–अलग तरह की छाप छोड़ते हैं। चिंता की बात यह है कि इनमें से ज्यादातर, सच्चाई से कोंसो दूर, एक नकली दुनिया को परोसते रहते हैं।

पुरुष टीवी पर ज्यादातर समाचार और खेलकूद से जुड़े कार्यक्रम देखते हैं वहीं औरतें ज्यादातर नाटक या फिल्में देखना पसन्द करती हैं, जो 90 प्रतिशत महिलाओं के जीवन से बिल्कुल उलट होते हैं। धारावाहिकों में दिखायी जाने वाली औरतें ज्यादातर गहनों से लदी होती हैं और उनके पास एक दूसरे के खिलाफ साजिश रचने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं होता। आम महिलाएँ खुशफहमी में होती हैं कि यह एक खूबसूरत दुनिया है जिसमें वह फिल्म और नाटकों की महिलाओं को जीते देखती हैं।

यह धारावाहिक उनके अन्दर की एकता को खत्म करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं, जिसे वे बोलने और सोचने–समझने की आजादी समझती हैं। लेकिन असल में औरतों के ऊपर थोपे जाने वाली पितृसत्ता के दो मुख्य चेहरे हैं। एक वह जो बहुत साफ है, जिसे हम आसानी से देख और समझ सकते हैं। जिसका हम खुलेआम विरोध करते हैं, जिसकी हरकतें हमारे सामने साफ होती हैं, जैसे मारपीट, खानपान में भेदभाव, यौन उत्पीड़न आदि। पितृसता के इस रूप को हम सामन्ती पितृसत्ता का नाम दे सकते हैं। वहीं दूसरी ओर पितृसत्ता का दूसरा रूप पूँजीवादी पितृसत्ता है जो देखने में बहुत रंगबिरंगा, खूबसूरत और आकर्षक लगता है। जिसकी बेड़ियों को हम लड़कियाँ आजादी का एक रूप समझने लगती हैं। पूँजीवादी पितृसत्ता सामन्ती पितृसत्ता से कहीं ज्यादा खतरनाक है और समाज में गहराई तक अपनी जड़ जमाये हुए है। यह महिलाओं की वह मित्र जो उनके पीछे उन्हीं की पीठ में बहुत प्यार और खूबसूरती के साथ पूँजीवाद का खंजर घोंप रही है।

टीवी पर आने वाले महिला विरोधी धारावाहिक, फिल्में और विज्ञापन इसी पूँजीवादी पितृसत्ता को मजबूती देते हैं। देश–विदेश में चलने वाला हर विज्ञापन महिलाओं को पूँजीवादी पितृसत्ता के बेड़ियों में बांधकर आजाद और स्वतन्त्र दिखाता है। 2016 के रिन साबुन के एक विज्ञापन में एक औरत जो कि डॉक्टर है, वह जब अपनी ससुराल में घर का सारा काम निबटाये बिना अपनी नौकरी पर चली जाती है और इस कारण उसकी सास उसे ताने मारती है और उससे नाराज होती है तब इस दिक्कत से बचने के लिए उसकी एक सहेली उसे रिन साबुन का इस्तेमाल करने को कहती है, जिससे वह नौकरी के साथ–साथ घर का काम भी निपटा सके और अपने घरवालों को खुश भी रख सके। इसी तरह के विज्ञापन हमारे चारों ओर भरे पड़े हैं। अगर बात करें सौन्दर्य प्रसाशनों के विज्ञापनों की तो वह धारावाहिक और फिल्मों से भी कहीं ज्यादा खतरनाक हैं। उन विज्ञापनों के स्लोगन औरतों की व्यवहारिकता और एकता को तोड़ने में जुटे हुए हैं और यह अपने इस काम में बहुत हद तक कामयाब भी हो चुके हैं।

विज्ञापन जो अपना सामान बेचने के लिए औरतों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं और असल नारीवाद के बजाय नारीवाद का एक उल्टा और गलत चेहरा पेश करते हैं जिसे औरतें आसानी से और खुशी–खुशी अपने व्यवहार में उतारती हैं। लेकिन यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता। इन धारावाहिकों, फिल्मों और विज्ञापनों में औरतों के अस्तित्व के सवाल को छोड़कर अस्मिता के सवाल को मुख्यता दी जा रही है। टीवी जगत के फैलाये गये झूठे नारीवाद ने नारी मुक्ति आन्दोलन के सवालों में उन 80 प्रतिशत महिलाओं के अस्तित्व के सवाल को पीछे छोड़ दिया है जो 20 रूपये प्रतिदिन पर अपना गुजारा करती हैं। इसके बजाय दिल्ली की सड़कों पर शॉर्ट्स पहनकर, सिगरेट और बीयर पीने के सवाल और संघर्ष को महिलाओं की मुक्ति का मुख्य सवाल बना दिया है। इन विज्ञापनों और धारावाहिकों ने औरतों में इतना “मैं” भर दिया है कि वे इस “मैं” को साबित करने के चक्कर में “हम” शब्द का अर्थ भूलती जा रही हैं। उनके अन्दर की एकता और व्यवहारिकता कमजोर हो चुकी है।

इसी कारण आज कोई ऐसा बड़ा महिला संगठन नजर नहीं आता है जो महिलाओं के असल मुद्दों को सामने ला सके और उनके लिए लड़ सके। आज अगर हम एक मजबूत संगठन बनाना चाहते हैं तो हमें अपनी आजादी और समानता के असल मुद्दों को प्रमुखता देनी पड़ेगी और अपने अन्दर से ‘मैं’ शब्द को निकालकर ‘हम’ शब्द को अपनाना होगा। तभी हम अपने असल दुश्मन को पहचान पाएँगे और हमारे मोर्चे को इसका असल मुकाम हासिल होगा।

–– उत्सा प्रवीण

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