Monday, September 23, 2024

महिलाओं का संघर्ष : “एक निजी और सामाजिक यात्रा”

विश्व में हर बार 8 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इस दिन पूरी दुनिया में लैंगिक समानता, महिलाओं के अधिकार, महिलाओं की विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धियों का जश्न मनाया जाता है। इतिहास के नजरिये से देखें तो 1909 में पहली बार अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी द्वारा महिला दिवस मनाया गया, जिसका प्रमुख उद्देश्य महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलाना था। वह इसमें सफल भी रही। तब वहाँ महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला और उन्हें एक नागरिक समझा जाने लगा। ये सभी बातें हमारे स्कूल के पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं।

इस पाठ्यक्रम का हमारे जीवन से क्या रिश्ता है, इसको समझने के लिए छात्राओं ने महिला दिवस को समाज से जोड़ने का निर्णय किया। हमने इसके लिए छात्रों और शिक्षकों की एक बैठक की, जिसमें हमने तय किया कि हम महिला दिवस का कार्यक्रम किसी गाँव में करेंगे। उसके लिए लोगों को इकठ्ठा कैसे करेंगे? हमें इसके लिए किस गाँव को चुनना चाहिए? अगर हम किसी गाँव को चुन रहे हैं तो उसको चुनने के क्या–क्या नुकसान और क्या–क्या फायदे हैं? इत्यादि बातों को ध्यान में रखकर हमने ‘बडावद गाँव’ को चुना। अब इस गाँव को चुनने के बाद हमारे सामने यह समस्या आयी कि इतनी दूर औरतों को कैसे इकट्ठा किया जाये? फिर शिक्षकों और छात्रों ने इस समस्या को सुलझाने के लिए एक बैठक की, उस बैठक से यह विचार निकलकर आया कि हम अपनी बात को लेकर गाँव के प्रत्येक घर में जायें।

हमने अलग–अलग समूह बाँट लिये। हमारे अलग–अलग समूह गाँवों में जाते और 8 मार्च अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के बारे में बताते। महिलाओं को बडावद गाँव (बागपत) के लिए आमन्त्रित करते।

इसी तरह से जिस समूह में मैं थी, वह समूह गुराना गाँव में गया था। गुराना गाँव में हमने लोगों के घरों में जाना शुरू किया। वहाँ कभी कोई हमारी बात सुनता, तो कोई हमारी पूरी बात सुने बिना ही मना कर देता। किसी को यह भी लगता कि हम स्कूल की तरफ से प्रवेश दिलाने के लिए आये हैं, हम लोगों को बताते की हम स्कूल से नहीं आये हैं, हम आपको महिला दिवस के लिए आमन्त्रित करने आये हैं। वैसे तो गाँव में घूमते समय हर घर की महिला की जिन्दगी की एक कहानी थी। मैं गुराना गाँव के एक घर की कहानी साझा कर रही हूँ, जिसने हमें पूरी तरह से झकझोर दिया कि आज भी औरतें इस तरह से दमघोंटू जीवन जी रही हैं।

जैसे ही हमने उस घर का दरवाजा खटखटाया अन्दर से दो आदमियों की आवाज आयी, आ जाओ। एक कड़क आवाज के साथ उन्होंने हमारा स्वागत किया। हम घर के अन्दर गये, तो हमें चारपाई पर बैठे हुए दो बुजुर्ग मिले जिनकी उम्र करीब 65–70 साल तक होगी। वे हमें ऐसे घूर रहे थे, जैसे कि हमने उनका कुछ छीन लिया हो। हमने उन्हें नमस्कार कर कहा कि हमें आप के घर की औरतों से मिलना है, आपकी इजाजत चाहिए। वह ताऊजी कहने लगे कि इजाजत की क्या? आप अन्दर चले जाओ। एक तो यही बरामदें में सो रही होगी। जैसे ही हम घर के अन्दर बढ़े, एक माँ जी छत से हँसते हुए बोलीं, ‘बेटे––– हमसे मिलकर क्या करोगे? अब हमारी उम्र स्कूल में पढ़ने की नहीं रही’। मैंने उनसे कहा कि आप एक बार नीचे उतर कर हमारी बात तो सुनो, वह नीचे आयीं और अपनी सोती देवरानी को भी उठा दिया।

हम उनसे बात करने लगे। जब हमने उन्हें भरोसा दिला दिया कि हम कोई बाहर से नहीं हैं, आपकी ही बेटी की तरह हैं, तब वह हमें अपनी आप बीती बताने लगीं कि बेटा हम आप के साथ बडावद गाँव में कैसे जा पाएँगी? आपको सामने चारपाई पर बैठे जो दो बुड्ढे नजर आ रहे हैं, इसमें एक मेरा और एक मेरी बहन का पति है। ये हमें कहीं नहीं जाने देते। सिर्फ अपने साथ खेतों पर काम करवाने के लिए ले जाते हैं। वे महिलाएँ कहने लगीं कि अगर हमारे पड़ोस में कोई मर जाये, तो उन्हें भी हम देखने नहीं जा सकतीं, अगर ये सो रहे हों, तब हम भले ही चोरी से चली जायें और अगर कभी किसी से बात कर लें और इन दोनों भाइयों में से किसी एक को भी पता चल जाये, तो दूसरा उसको बता देता है। फिर हमारी पिटाई होती है।

जहाँ पर हम बैठ कर बात कर रहे थे उसके पास उन महिलाओं की बहुओं के कमरे थे। हमारी बातें सुनकर वे भी बाहर आ गयीं और कहने लगीं कि इतना ही नहीं अगर हमारा बच्चा बीमार हो जाये तो भी हम दवा लेने नहीं जा सकती। कहते हैं कि बच्चों की दवा का तो बहाना है, पर्स टांग कर घूमने जाना है। माँ जी की तो जिन्दगी गुजर गयी, इनके बेटे जिनके साथ हमारी शादी हुई है वे भी ऐसे ही हैं। अगर हम बीमार हो जाएँ तो हमें छूकर देखते हैं कि सच में बीमार हैं, या बहाना बना रही हैं।

तब तक उनकी छोटी बहू बोली कि मैं आप को एक घटना बताती हूँ कि लोग तो आज कल सारी चीजें ऑनलाइन मँगाते हैं। मैंने एक दिन सेनेटरी पैड मँगा लिया, जब तक हमारे कमरे में घुसकर देख नहीं लिया तब तक माने नहीं। देखने के बाद भी मान जाते ऐसा भी नहीं हुआ। उसके बाद हमें बहुत ज्यादा खरी–खोटी सुनायी और पूरे घर को सिर पर उठा लिया। आप लोगों को तो इसलिए आने दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि आप लोग बच्चों को स्कूल में ले जाने के लिए आये हैं। अगर यह पता होता कि आप हमें बुलाने आयी हैं तो आप को गेट में भी न घुसने देते। इस घर में लड़की पैदा होना तो जुल्म है। हम लोग जब उठकर चलने लगे तो उन चारों महिलाओं ने हमारा हाथ पकड़ लिया कि थोड़ी देर और बैठ लो, पहली बार हमारी बात सुनने के लिए कोई आया है। तब तक उसकी बड़ी बहन बोली कि बेटा हमारा नसीब खराब था कि हमारी दोनों की शादी इस घर में हुई।

एक तरफ तो हमें ऐसी महिलाएँ दिखती हैं जो माउंट एवरेस्ट पर जा रही हैं दूसरी तरफ औरतें घरों में कैद हैं। हमें दोनों के बीच एक बहुत चैड़ी खाई नजर आती है।

अब मैं आप लोगों से दूसरे गाँव की महिलाओं की बात साझा करती हूँ। हमें एक ऐसी महिला मिली जिसका बीएड पूरा होते ही शादी कर दी गयी थी। उसके बाद वह नौकरी करना चाहती थी। लेकिन परिवार वालों ने उसे नौकरी नहीं करने दी। उसका कहना था कि मैं डिग्री लेने के बाद घर वालों की सेवा–टहल कर रही हूँ। बीएड करके नौकरी करना तो बस मुझे एक सपना सा लगता है।

इसी तरह से हमने कुल 9 गाँवों की महिलाओं से सम्पर्क किया, जिन गाँवों में हमारे शिक्षक–छात्र गये थे। हमने आपको अलग–अलग घटनाएँ बतायीं, यह उन सभी महिलाओं की थी जो अभी किसी न किसी तरह से घरों में कैद हैं, लेकिन आजाद होना चाहती हैं।

मैं आपको एक और महिला का अनुभव साझा करूँगी जो सरकारी डॉक्टर है। वह बता रही थी कि वह नौकरी तो करती हैं लेकिन उस पैसे को अपनी मर्जी से खर्च नहीं कर सकती। उन्होंने बताया कि जब वह गर्भवती थी, उस समय कुछ अलग–अलग चीजें खाने का मन करता था। जब उनकों नौवाँ महीना लगा, उनका मन सेब खाने को मचल रहा था। उन्होंने अपने पति से कहा कि मेरा सेब खाने का मन है, उनके पति ने चोरी से एक सेब लाकर दिया। घर वालों के चलते वह भी उनको नसीब नहीं हुआ। वह महिला यह बात बताते समय भावुक हो गयी।

जब हम गाँवों में गये तो हम बहुत सारे मामलों से रूबरू हुए जिनके बारे में हमने कल्पना भी नहीं की थी। एक सप्ताह गाँवों में घूमने के बाद हम बडावद गाँव पहुँचे, 8 मार्च अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का कार्यक्रम करने। जब हमने महिला दिवस मनाने का सोचा था तो बहुत सारे लोगों ने हमें हतोत्साहित किया कि कार्यक्रम में महिलाएँं आयेंगी ही नहीं, इसलिए कार्यक्रम को लेकर हम बहुत आशान्वित नहीं थे।

साढ़े बारह बजे तक सिर्फ इक्का–दुक्का महिलाएँ ही आयीं। हमारे चेहरे पर उदासी आने लगी कि हमारी इतनी मेहनत के बाद भी हम महिलाओं को एकजुट नहीं कर पायें। लेकिन जैसे ही एक बजा कि हमें महिलाओं की भीड़ नजर आने लगी। किसी गाँव से बस से तो किसी गाँव से रिक्शा भर–भर कर महिलाएँ आने लगीं और देखते ही देखते हमारे अनुमान से दोगुनी महिलाएँ कार्यक्रम में शामिल हुर्इं।

हमने पूरे उत्साह के साथ कार्यक्रम शुरू किया जिसमें हमारे पास तीन महिलाएँ ऐसी थीं जो अपनी जिन्दगी में संघर्ष करती हुई आगे बढ़ीं और किसी तरह से यहाँ तक पहुँचीं। इसी तरह से अलग–अलग महिलाओं ने अपना संघर्ष साझा किया। मुश्किलें कितनी भी आयीं और अगर महिलाएँ किसी भी काम को सफल बनाने का निर्णय कर लें, तो वह उसे सफल बना सकती हैं। सभी एक दूसरे से यह चर्चा कर रही थीं कि हमारे जीवन में ऐसी कौन–कौन सी बाधाएँ हैं, जो हमें हमारी उड़ान भरने से रोकती हैं। हर एक के चेहरे पर एक नई चमक दिख रही थी। उन सभी महिलाओं को इस तरह देखकर हमारे मन में और भी उत्साह आ गया और फिर हम सब ने अपनी महिला साथियों के साथ मिलकर एक गाना गाया––

इसलिए राह संघर्ष की हम चुने,

जिन्दगी आँसुओं में नहायी न हो।

इस गाने के साथ पूरे हॉल में आवाज बुलन्द हो गयी और उस दिन सब ने संघर्ष की ओर कदम बढ़ाते हुए कार्यक्रम को सफल बनाया। हम कई औरतों से मिलीं–– जो नौकरी कर रही हैं उनसे भी और उनसे भी जो पढ़ने के बाद आज भी घरों में कैद हैं। हमें यह समझ आया कि हम पूरी तरह से तभी आजाद हो सकती हैं जब हर औरत आजादी से अपना फैसला ले सकेगी, हर पुरुष उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेगा। सही मायने में महिला दिवस तभी सार्थक सिद्ध होगा जब महिला अपने महिला होने पर गर्व महसूस करेगी।

इस पूरे कार्यक्रम के दौरान छात्रों और शिक्षकों की महिलाओं को लेकर गहरी समझदारी बनी। छात्र–शिक्षक महिला उत्पीड़न और शोषण से परिचित हुए। असली जिन्दगी की ये हकीकतें टेलीग्राम, इन्स्टाग्राम और फेसबुक की चमकती दुनिया से बाहर हैं।
–– नीतान्शी
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Friday, September 20, 2024

लम्बी दूरी

 

    शाम को जब शहाना अपने काम से घर वापस आयी तो उसने देखा कि अब्बा बहुत गहरी सोच में बैठे हुए हैं। इतनी गहरी सोच में कि उन्हें उसके आने की आहट तक न हुई। उसने अपनी सोयी हुई बेटी को धीरे–से प्यार किया और पानी पीने चली गयी। फिर उसने अब्बा से पूछा, “अब्बा, खाने में आज क्या बनाऊँ?

    अब्बा अभी तक किसी चिन्ता में खोये बैठे हुए थे। शहाना ने धीरे से अब्बा के कंधे पर हाथ रखा तो अब्बा ऐसे चैंक पड़े जैसे अभी नींद से जागे हों।

    तू कब आयी?अब्बा ने पूछा।

    अभी कुछ देर पहले” शहाना ने जवाब दिया।

    तू मुझसे कुछ कह रही थी बिटिया?

    हाँ, मैं तो खाने के लिए पूछ रही थी कि आज खाने में क्या बनाऊँ, पर आप न जाने कौन–सी चिन्ता में डूबे हुए हैं कि मेरी बात ही नहीं सुनते!”

    चिन्ता तो सता रही है बिटिया, दो महीने से घर का किराया नहीं दिया, आज चैधरी फिर किराया माँगने आया था...”

    बात को बीच में ही काटते हुए वह बोल पड़ी “उफ्फ, कहने को तो यह मकान मस्जिद के नाम है, मगर एक महीने का किराया चढ़ जाए तो इसकी देख–रेख करने वाले खाते–पीते लोगों को सब्र नहीं होता।”

    हाँ..., कह रहा था, मस्जिद में कुछ मरम्मत करानी है। अब बताओ तो जरा, इतनी आलीशान मस्जिद बनी हुई है भला उसमें किस बात की कमी है? अभी तो कोई कमी नजर नहीं आती। फिर भी इन लोगों को उसमें मरम्मत कराने की पड़ी रहती है। हमारे टॉयलेट पर किवाड़ नहीं लगवा रहे हैं। हमें पर्दे से काम चलाना पड़ रहा है। लेकिन इन लोगों को वह कमी, कमी नहीं लगती और महीना पूरा होते ही किराया चाहिए। चैधरी साहब कह कर गये हैं... अगर इस महीने किराया नहीं दिया तो यह घर खाली कर देना। मेरा तो दिमाग खराब हो रहा है।... तेरा जो मन है तू बना ले।”

    शहाना भी विचारों में डूबी हुई चूल्हे की तरफ बढ़ी और चूल्हे पर दाल चढ़ाकर अपनी सोयी हुई बच्ची के पास जाकर लेट गयी। वह सोच रही थी कि इस मकान में 10 कमरे हैं। किसी भी कमरे की फर्श पक्की नहीं है, कच्ची ही जमीन है। इसमें रहने वाले किसी भी किराएदार को किचन नसीब नहीं है। सभी को अपने आँगन में ही खाना बनाना पड़ता है। टॉयलेट–बाथरूम पर किवाड़ नहीं है, पर्दा डाला हुआ है। किसी दिन बहुत तेज हवा चलती है तो नहाना या टॉयलेट में जाना बहुत मुश्किल हो जाता है। जो लोग इसका किराया लेने आते हैं उनको यह कमियाँ दिखायी ही नहीं देतीं! यह सब सोचते–सोचते वह अपने अतीत में खो गयी। उसको वे सारी चोटें याद आ गयीं जो उसने अपने बचपन से लेकर शादीशुदा जिन्दगी तक खायी थीं।

    शहाना बचपन से ही अपने अम्मा, अब्बा और बहन–भाइयों के साथ इसी घर में रही थी। अब्बा रिक्शा चलाते थे। दो भाई और चार बहनों में वह सबसे छोटी थी। चार बहनें होने की वजह से अब्बा को हमेशा यह चिन्ता सताती रहती थी कि खाने को तो है नहीं, बेटियों की शादी के लिए दहेज का इन्तजाम कैसे होगा। दहेज नहीं दिया तो कौन करेगा उनकी बेटियों से शादी। दूसरे लोग तो इतना दहेज दे रहे हैं फिर भी ससुराल वाले उनकी बेटियों को ताना देते रहते हैं। उन्हें तो मकान का किराया जुटाने के लिए ही हाड़–तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। दहेज कैसे इकट्ठा करूँगा। इन्हीं चिन्ताओं ने अब्बा को वक्त से पहले बूढ़ा कर दिया था।

    बड़ी बहन की उम्र भी शादी के लायक हो रही थी, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति देखकर कोई उनके यहाँ रिश्ता करने को तैयार नहीं था। एक दिन बड़ी बहन का रिश्ता आया भी तो दो बच्चों के बाप से। अब्बा ने पहले तो मना किया, लेकिन अपनी स्थिति को देखते हुए शादी कर दी। कुँवारी बच्ची दो बच्चों के बाप से ब्याह दी, यह सोच–सोच कर एक दिन अब्बा को दिल का दौरा पड़ गया। इलाज भी मोहल्ले वालों ने चन्दा करके कराया। इधर अम्मा भी इसी चिन्ता में घुट रही थी कि बाकी तीन बेटियों की शादी कैसे होगी? क्या उन्हें भी ऐसे ही बेमेल या कुछ कमी वाले लड़कों के साथ ब्याहना पड़ेगा!

    उनके घर की यह हालत देखकर दोनों फुफ्फों ने बहुत सादे तरीके से बिना दहेज के दो बेटियों से अपने बेटों की शादी कर दी। पूरा परिवार अब थोड़ी सुकून की साँस ले रहा था। लेकिन वे भूल गये थे कि अब्बा की बहनें भी तो इसी समाज का हिस्सा हैं। कुछ दिनों तक दोनों बहने अपने ससुराल में खुश रहीं, लेकिन कुछ दिनों बाद फुफ्फों ने भी सास बनकर ताना देना शुरू कर दिया। वह कहती कि अगर वह अपने बेटों की शादी किसी दूसरे घर में करतीं तो उनको खूब दहेज मिलता। यह सुनकर भी बहुएँ कोई जवाब न देती थीं, क्योंकि तानों और दिन भर गुलामों की तरह काम करके उनको दो वक्त का खाना मिल जाया करता था। अपने घर आतीं तो शायद अब्बा उनको इतना भी न खिला पाते। आस–पड़ोस के लोगों के ताने भी अब्बा को मार डालते। जैसे–तैसे दोनों बहनें अपनी ससुराल में अपनी जिन्दगी गुजार रही थीं।

    कुछ साल बीतने के बाद शहाना का भी रिश्ता आया। वह अभी केवल पन्द्रह साल की थी। लड़के वालों की आर्थिक स्थिति इनसे कुछ ठीक थी। लड़के में भी कुछ कमी नहीं थी। उनका कहना था कि वह किसी अपने जैसे घर में ही रिश्ता करना चाहते हैं। उनको लड़की वालों से कुछ नहीं चाहिए, सिवा लड़की के। अब्बा ने पन्द्रह दिन के अन्दर ही उसकी शादी कर दी।

    लेकिन ससुराल वालों ने बहू के रूप में उसे एक गुलाम बना कर रखा। वह ठीक है या नहीं, किसी को परवाह नहीं होती थी। उन्हें केवल घर का काम कराना था। यहाँ तक कि उसके शौहर को भी उसकी कोई परवाह नहीं थी। उसे भी केवल उसके साथ सोने से मतलब था। शादी के कुछ दिन बाद वह गर्भवती हुई। उसकी सास यह सोचकर खुश थी कि उसके आँगन में अब उसका पोता खेलेगा। पोती भी आँगन में खेल सकती है यह किसी ने नहीं सोचा, क्योंकि पोती तो किसी को चाहिए ही नहीं थी।

    शहाना तो माँ बनने वाली थी, उसे बेटा या बेटी से कोई मतलब नहीं था। वह अपने होने वाले बच्चे के बारे में सोचकर खुश थी। नौ महीने पूरे हुए और डिलीवरी का समय आ पहुँचा। सब की आँखें बेसब्री से डॉक्टर को ढूँढ रही थीं कि कब डॉक्टर आकर बोले कि पोता आया है। आखिर कुछ घंटे इन्तेजार करने के बाद नर्स ने आकर बताया कि बेटी हुई है। बेटी को गोद में लेकर बहुत खुश हुई थी शहाना, लेकिन उसे कहाँ पता था कि उसकी बेटी को ये लोग बोझ समझेंगे।

    बेटी हुई है,” सुनकर कोई भी उसके पास बेटी को देखने तक नहीं आया। उसने कुछ खाया है या नहीं या वो कैसी है, यह किसी ने नहीं पूछा। यहाँ तक कि बेटी का बाप भी उसके पास नहीं आया, न ही शहाना का हाल–चाल पूछा। सासू माँ ने अपने बेटे से बोल दिया कि फेंक आ दोनों को उसके मायके, बेटे ने वैसा ही किया। अस्पताल से जल्द से जल्द छुट्टी करा कर शहाना और उसकी बेटी को उसके मायके छोड़ आया।

    अब्बा बूढ़े होने के कारण अब पहले से कम कमाते थे। भाइयों की शादियाँ हो चुकी थीं। भाई अलग मकान में रहते थे। अब अम्मा और अब्बा जैसे–तैसे अपना गुजारा कर रहे थे। अब्बा उन्हें देखकर बहुत खुश हुए। दामाद के सर पर हाथ फेरा, उसकी बच्ची को प्यार किया और शहाना को गले लगाया, लेकिन जैसे ही उनका दामाद अनवर उसे छोड़कर जाने लगा, अब्बा के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी। खुद खाने को तो है नहीं, जच्चे–बच्चे को कैसे खिलाएँगे। शाम को शहाना ने अब्बा को सारी बात बतायी तो अब्बा फूट–फूट कर रोने लगे। उस रात अम्मा, अब्बा और शहाना, तीनों में से कोई नहीं सोया।

    अब्बा कर्ज लेकर उसकी दवाई और खाने–पीने का इन्तजाम कर रहे थे।

    दो महीने बीत गये। एक दिन अनवर घर आया और शहाना से घर चलने को बोला। वह और उसकी अम्मी बहुत खुश हुए। अब्बा उस वक्त रिक्शा चलाने गये हुए थे। शाम को अब्बा वापस आये तो अनवर को देखकर खुश हुए। अनवर उसे अपने साथ घर ले आया। उसे लगा कि शायद दादी का मन बदल गया है इसलिए पोती को घर बुला लिया। शायद सासू माँ की नाराजगी खत्म हो चुकी हो, लेकिन वह गलत थी। उसे केवल एक नौकरानी की हैसियत से घर बुलाया गया था।

    वह अपनी छोटी सी बच्ची को चारपाई पर लिटाकर पूरा दिन घर के काम करती, बच्ची भूख से घंटों रोती–बिलखती रहती। अगर वह बच्ची के पास जाने की कोशिश करती तो पास में ही चारपाई पर बैठी सास चिल्लाकर कहती, “रोने दे, तू अपना काम कर, रोने से यह मर नहीं जाएगी।”

    बच्ची की तबीयत शुरू से ही ठीक नहीं रहती थी और ठीक से देखभाल न होने के चलते वह सूखती ही जा रही थी। अभी बच्ची चार महीने की ही हुई थी कि शहाना फिर से गर्भवती हो गयी। अपनी बच्ची की बिगड़ी हुई सेहत देखकर उसने अनवर से अबॉर्शन की बात की। इतना सुनते ही अनवर उस पर भड़क कर बोला, “तेरा दिमाग खराब है क्या? अगर यह बेटा हुआ तो... यह बेटा ही होगा। कोई जरूरत नहीं है दवाई खाने की।”

    उस दिन उसे एहसास हुआ कि औरतों को अपनी मर्जी से चलना तो दूर, उसको जाहिर करने का भी हक नहीं होता। वह कर भी क्या सकती थी? बच्चा पलने दिया पेट में। वह पेट से है यह बात सुनकर सासू माँ भी अब थोड़ा सीधे मुँह बात करने लगी। घर का माहौल उसके लिए कुछ ठीक हुआ। यह अच्छे दिन भी उसकी किस्मत में कहाँ थे! नौ महीने बीते और दूसरी बार भी बेटी हुई। एक तरफ शहाना बेटी को लेकर खुश थी, तो दूसरी तरफ अब्बा के घर फेंके जाने का डर उसकी रूह कँपा रहा था।

    बच्ची में खून की कमी है” डॉक्टर ने बताया, पर इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि सबको लड़का चाहिए था। पेट में पलने वाला बच्चा लड़की है यह अनवर को पहले पता होता तो दोनों को उसी दिन मार डालता जिस दिन शहाना ने उसको अपने गर्भवती होने की खबर दी थी।

    इस बार भी अनवर उसे दोनों बेटियों के साथ मायके छोड़ आया। उस दिन अब्बा के घर में जैसे मातम छा गया। पहले वाला कर्ज न चुका पाने की वजह से इस बार उधार मिलना भी मुश्किल था। अब्बा जैसे–तैसे शहाना और उसकी बच्चियों को पाल रहे थे।

    खाने की कमी के चलते माँ के दूध से बच्ची का पेट नहीं भरता था। फिर क्या, वही हुआ जिसका डर था। एक दिन बच्ची को दस्त और उल्टियाँ शुरू हुई और उसकी जान लेकर ही थमी। उस दिन शहाना ने अनवर को कई बार फोन किया। बहन से भी फोन करवाया, पर न उसने फोन उठाया और न ही वापस फोन किया। जैसे–तैसे मोहल्ले वालों ने खबर भिजवायी। उसने सोचा था कि बाप है, दिल पसीज जाएगा।

    अनवर लोक–लाज के डर से जनाजे पर तो आया, पर शहाना का हाल–चाल तक नहीं पूछा। उसकी सूनी आँखें अनवर को आखिर तक निहारती रहीं। उसकी एक नजर के लिए तरसती रहीं, पर उस पत्थर दिल को कोई फर्क नहीं पड़ा। वह जैसे आया वैसे ही वापस चला गया।

    वह रोती–बिलखती अपने मायके में पड़ी रही।

    उस दिन शहाना जी भर के रोयी। अपनी सारी तकलीफ, सारा दर्द और सारा डर उसने उन आँसुओं में बहा दिया। जी भर के रो लेने के बाद उसने अपने आँसू पोंछे और अपनी जिन्दगी का फैसला खुद ही करने के बारे में सोचा। उसने तय किया कि वह मोहल्ले की दूसरी मजदूर औरतों के साथ काम पर जाएगी। उसने सोचा कि औरतों को भी अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जीने का हक है।

    काम पर जाने के उसके एक फैसले ने उसकी और उसकी बच्ची की जिन्दगी बदल दी। उसने पॉलिथीन बनाने की फैक्ट्री में जाकर मजदूरी करनी शुरू कर दी। उसके बाद उसने मुड़ कर कभी अपने ससुराल वालों की तरफ नहीं देखा। वह अब अपने और अनवर के बीच के लम्बे फासले को खत्म नहीं करना चाहती थी। अब वह अपनी बच्ची को प्यार से पाल–पोस रही थी और फैक्ट्री में मजदूरी करके अपने अब्बा का सहारा भी बन गयी थी।

    अम्मी...ओ अम्मी” बच्ची ने आवाज दी।

    हम्म... हाँ बेटा, मैं यही हूँ” शहाना को लगा जैसे वह गहरी नींद से जागी हो।

    अम्मी, मुझे भूख लगी है।”

    शहाना ने अपनी बच्ची को प्यार किया और उसके लिए खाना लाने चली गयी।

–– शहरीन