Friday, September 6, 2024

उत्तराखण्ड : लिव–इन सम्बन्ध और समान नागरिक कानून

 


7 जनवरी 2024 को उत्तराखण्ड में ‘समान नागरिक संहिता बिल’ (यूसीसी) लागू किया गया है। उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य है जिसने अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर सभी समुदायों पर शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव–इन सम्बन्ध के मामले में समान नागरिक संहिता थोपने का काम किया है।

विचारणीय प्रश्न यह है कि अगर यह कानून नागरिकों के बीच समानता लाने के लिए लागू किया गया है तो इसे केन्द्रीय सरकार द्वारा पूरे देश में क्यों नहीं लागू किया गया?

दूसरे, उत्तराखण्ड में भी इसे अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर बाकी धर्मों और समुदायों पर क्यों लागू किया गया?

जिस तरह अलग–अलग जाति–धर्म के लोगों के जीवन जीने के अलग–अलग तौर–तरीके और परम्पराएँ होती हैं, उसी तरह किसी जनजाति के भी हैं। इस तरह यह अपने–आप में समानता का बोध दिलाने में विफल है। सिर्फ एक राज्य में ऐसा कानून लागू करना उस राज्य को बाकी देश से अलग करने की साजिश जैसी लगती है।

इस तरह का कानून लागू करने के पीछे भाजपा सरकार और आरएसएस का मुख्य उद्देश्य है–– देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की तरफ धकेलना, ताकि बाकी धर्मों और समुदायों की मूल्य–मान्यताओं को खत्म करके हिन्दू रीति–रिवाजों को सभी के ऊपर थोपा जा सके। इस कानून के अन्तर्गत सबसे बड़ा बदलाव किया गया है लिव–इन सम्बन्ध को लेकर। लिव–इन उस रिश्ते को कहा जाता है जिसमें दो बालिग प्रेमी आपसी सहमति से शादी के बन्धन में बन्धे बिना एक–दूसरे के साथ लम्बे समय तक अपना जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। कई प्रेमी जोड़े इसलिए लिव–इन रिश्ते में रहते हैं ताकि वह साथ रहकर यह तय कर सकें कि आगे चलकर वे एक–दूसरे से शादी के योग्य हैं या नहीं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें पारम्परिक विवाह–व्यवस्था में कोई दिलचस्पी नहीं होती, इसलिए भी वे ऐसे रिश्ते में रहना पसन्द करते हैं। कुछ जोड़े ऐसे भी हैं जिन्हें यकीन है कि उनके परिवार उनका एक–दूसरे के साथ शादी करना बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे तो वे लोग भी परिवार से छुपकर लिव–इन रिश्ते में रहते हैं। खासकर हमारे भारतीय समाज में विवाह दो लोगों के बीच न होकर दो परिवारों के बीच बनने वाला सम्बन्ध होता है, जिसके चलते अकसर लड़कियों को अपनी पसन्द–नापसन्द छोड़कर पूरे परिवार की मनमानी चाहे–अनचाहे पूरी करनी पड़ती है। इसके चलते उन्हें अपने कैरियर तक को दाँव पर लगाना पड़ता है।

इसी सब के चलते बहुत–सी लडकियाँ ससुराल पक्ष वाले परिवार की अपेक्षाओं के अनावश्यक बोझ से बचने के लिए लिव–इन रिश्ते का रास्ता चुन लेती हैं, जो अपने–आप में एक लोकतांत्रिक रास्ता है और इसके चलते किसी को भी समाज में परेशानी नहीं होनी चाहिए।

लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक चार दशक पहले 1978 में बद्री प्रसाद बनाम डायरेक्टर ऑफ कंसोलिडेशन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार लिव–इन रिश्ते को मान्यता दी थी। यह माना गया था कि शादी करने की उम्र वाले लोगों के बीच ऐसा रिश्ता किसी भारतीय कानून का उल्लंघन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई जोड़ा लम्बे समय से साथ रह रहा है तो उस रिश्ते को शादी के बराबर ही माना जाएगा।

लेकिन समान नागरिक संहिता (यूसीसी) बिल पारित होने के बाद से उत्तराखण्ड में लिव–इन रिश्ते में रहने वाले जोड़े को एक महीने के अन्दर अपने रिश्ते का रजिस्ट्रार ऑफिस में पंजीकरण करवाना अनिवार्य हो गया है, जिसे न करने पर प्रेमी जोड़े को तीन से छ: माह की सजा हो सकती है। प्रेमियों में से कोई भी अगर उस रिश्ते को आगे न बढ़ाकर रिश्ता खत्म करना चाहे तो भी पंजीकरण आवश्यक है और इस प्रक्रिया के दौरान सरकारी रजिस्ट्रार अफसर द्वारा संक्षिप्त पूछताछ भी की जाएगी। पंजीकरण होगा भी या नहीं वह भी इस पूछताछ पर निर्भर है। जिस समाज में पहले ही प्रेमी जोड़ों के ऊपर कभी ‘लव–जिहाद’ के नाम पर तो कभी ‘एंटी–रोमियो स्क्वाड’ बनाकर या पार्क में बैठे जोड़ों पर हमला कर दिया जाता है वहाँ रजिस्ट्रार अफसर उनसे क्या–क्या निजी सवाल पूछेंगे, यह किसी भी जोड़े के लिए परेशान करने वाली बात है। इस तरह की सरकारी नैतिक पहरेदारी किसी भी नागरिक की निजी जिन्दगी पर और उसके मौलिक अधिकारों पर हमला है। हमारा समाज पहले से ही अपने पसन्द की शादी या जीवनसाथी चुनने के खिलाफ है, ऐसे में प्रेमी जोड़ों के ऊपर इस तरह का कानून लागू करना सरासर नाइन्साफी है।

मीडिया संस्थान लाइव लॉ की माने तो लिव–इन रिश्ते की जड़ कानूनी तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 में मौजूद है। अपनी मर्जी से शादी करने या किसी के साथ लिव–इन रिश्ते में रहने की आजादी और अधिकार को अनुच्छेद 21 से अलग नहीं माना जा सकता है।

जनसत्ता में प्रकाशित एक खबर के अनुसार 2001 में पायल शर्मा बनाम नारी निकेतन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि दो वयस्क लोगों को साथ रहने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा था कि हालाँकि हमारा समाज लिव–इन रिश्ते को अनैतिक मानता है, मगर कानून के हिसाब से न तो यह गैर–कानूनी है और न ही अपराध है। सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का बचाव (प्रोटेक्शन ऑफ वीमेन फ्रॉम डॉमेस्टिक वायलेंस एक्ट) अधिनियम, 2005 की धारा 2 एफ में घरेलू रिश्तों (डोमेस्टिक रिलेशनशिप) की जो परिभाषा दी है, उसमें लिव–इन रिश्ता भी शामिल है ताकि प्रेमी जोड़ा घरेलू हिंसा के मामले में कानूनी मदद लेकर अपना बचाव कर सके। लिव–इन रिश्ते में रहते हुए बच्चा होने पर बच्चे को वही सब अधिकार मिलेंगे जो पहले से शादी–शुदा लोगों के बच्चों को मिलते हैं। अलग होने या आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर महिला को जीवनयापन के लिए अपने पूर्व प्रेमी द्वारा भत्ता भी दिया जाएगा। इस तरह से देखा जाए तो लिव–इन रिश्ता समाज को आगे बढ़ाने में मददगार फैसला है। इसके चलते दो वयस्क लोग बिना दान–दहेज और कोई बड़ा आडम्बर किये बगैर तथा पुरातन समाज की सड़ी–गली मूल्य–मान्यताओं को छोड़कर एक नयी तरह की दुनिया बसाने का निर्णय लेते हैं।

एक तरफ जहाँ हमारे समाज में पत्नी को पति के ऊपर आर्थिक रूप से आश्रित होने और घर के अवैतनिक थकाऊ, बोझिल कामों में झोंक दिया जाता है वहीं दूसरी तरफ लिव–इन रिश्तों में रह रहे जोड़े अधिकतर आर्थिक और घरेलू अवैतनिक कामों को लेकर एक हद तक बराबरी पर आधारित रिश्ता चलाते हैं। ऐसे रिश्ते सामाजिक रूप से महिला–पुरुष के निजी जीवन में लोकतांत्रिक व्यवहार की स्थापना करने में मददगार साबित होते हैं। ऐसे रिश्ते धार्मिक कुरीतियों को छोड़कर भी समाज को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। यूसीसी के बारे में देश–विदेश पत्रिका के अंक 45 के सम्पादकीय का एक हिस्सा कुछ इस तरह है–– “इस कानून में तलाक, पैतृक सम्पत्ति और उत्तराधिकार तथा बहु–विवाह के मामले में भी हिन्दू कोड बिल 1955 के प्रावधानों को ही थोड़े हेर–फेर के साथ सभी समुदायों पर थोपने का काम किया गया है। हिन्दू कोड बिल में कई तरह की असमानताएँ मौजूद हैं। 21वें विधि आयोग ने सभी धर्मों के पर्सनल लॉ में कई तरह के सुधारों की सिफारिश की थी, लेकिन उसका मानना था कि समान नागरिक संहिता की अभी तत्काल कोई जरूरत नहीं है। 22वाँ विधि आयोग अभी उन सुझावों पर विचार कर रहा है। ऐसे में बिना व्यापक विचार–विमर्श और सलाह–सुझाव के जल्दबाजी में लाया गया यह कानून आरएसएस, भाजपा के संकीर्ण हिन्दुत्ववादी मंसूबों और अपने चुनाव घोषणापत्र के संकल्पों को हर कीमत पर पूरा करने का प्रयास मात्र है। मातृशक्ति के संरक्षण के नाम पर लाया गया यह कानून बेहद महिला विरोधी है और लम्बे संघर्षों और कानूनी लड़ाइयों से हासिल किये गये उनके अधिकारों को संकुचित कर देने वाला कानून है।”

समान नागरिक संहिता कानून पर और विस्तृत जानकारी के लिए मुक्ति के स्वर पत्रिका के अंक 26 में प्रकाशित निबन्ध ‘साम्प्रदायिकता से प्रेरित समान नागरिक संहिता का प्रस्ताव और जनवादी महिलाओं का दृष्टिकोण’ उत्साही और कौतूहली पाठकों को जरूर पढ़ना चाहिए।

–– स्वाति सरिता

Thursday, September 5, 2024

सम्पादकीय, मुक्ति के स्वर अंक 27


अभी हाल ही में देश में 18वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव सम्पन्न हुआ । पहली बार महिलाओं में चुनाव को लेकर अत्यधिक उत्साह दिखाई दिया । जहाँ पहले वे राजनीति या चुनावों के प्रति आमतौर पर उदासीन रहती थीं, इस बार सरकार की आर्थिक नीतियों और महँगाई से बदहाल होने के चलते उनमें रोष था, इसके अलावा प्रधानमंत्री के ऊटपटांग बयानों और भाजपा द्वारा लम्बे समय से महिलाओं को महज वोटर मानकर गाँव–मोहल्ले के स्तर तक उनके लिए कार्यक्रम (मुख्यत: कीर्तन मंडली, तीर्थ यात्रा, कलश यात्रा आदि) देते रहने, सभी पार्टियों द्वारा महिलाओं को लुभाने वाले नारों तथा टीवी, इन्टरनेट के प्रभाव में महिला वोटरों की संख्या बढ़ी । कहीं–कहीं तो पुरुष वोटरों की तुलना में महिला वोटरों का प्रतिशत ज्यादा रहा । 

 दूसरी ओर 2024 के आम चुनाव में 14 अलग–अलग राजनीतिक पार्टियों से देशभर में केवल 74 नयी महिलाएँ सांसद चुनी गयीं जो जो कुल सांसदों की संख्या का महज 13.6 प्रतिशत है । स्टेटिस्टा–डॉट–कॉम के अनुसार चुनाव में खड़े कुल उम्मीदवारों में महिलाओं का हिस्सा सिर्फ 10 प्रतिशत ही था । ये चुनाव अब तक के सबसे दिलचस्प चुनावों में से एक तो रहा, पर इसमें सत्ता पक्ष ने फूहड़ता और महिला विरोधी आचरण की सभी हदें पार कर दीं । तमाम बलात्कारियों या उनके रिश्तेदारों को टिकट दिये गये, प्रधानमंत्री ने खुद कर्नाटक में प्रज्ज्वल रेवन्ना जैसे बलात्कारी का चुनाव प्रचार किया जबकि उन्हें उसकी करतूतों के बारे में पहले से पता था। वे महिलाओं को डरा रहे थे कि विपक्षी गठबन्धन द्वारा उनका मंगलसूत्र, जो पितृसत्ता का प्रतीक है, छीन लिया जायेगा, हालाँकि इस देश में मंगलसूत्र सिर्फ मुट्ठी भर मध्य वर्ग की महिलाओं को ही नसीब है और वह भी टीवी सीरियल या फिल्मों के प्रभाव की बदौलत। 

पिछले कुछ सालों में विकट आर्थिक परेशानियों, साम्प्रदायिक राजनीति, और जमीनी हकीकतों ने निश्चय ही महिलाओं की चेतना को बढ़ाया है । लूट–खसोट पर आधारित चरम व्यक्तिवादी और व्यक्ति केन्द्रित राजनीति के खोखलेपन को उन्होंने अच्छे से महसूस किया । अब काफी महिलाएँ मानने लगी हैं कि उज्ज्वला या बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ कार्यक्रम महज जुमले हैं । चुनाव के समय स्वतंत्र यूट्यूब चैनलों के तमाम इण्टरव्यू में खुल कर सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की धज्जियाँ उड़ाती देखी गयीं । सच तो यह है कि गरीब तबके से आने वाली अधिकांश महिलाएँ समझ गयी हैं कि राम और मन्दिर उन्हें रोजी–रोटी नहीं देंगे । अयोध्या और काशी में भव्य मन्दिर निर्माण और राम पथ बनाने के नाम पर सैकड़ों घरों और दुकानों को उजाड़ा गया । वायरल वीडियो में बेघर–बार हुई बिलख–बिलख कर रोती महिलाओं के हिस्से मन्दिर निर्माण से भला क्या आया ? सिर्फ बर्बादी..  

जनता के आक्रोश और शक्ति ने भाजपा सरकार के तथाकथित विजय रथ का एक पहिया निकाल दिया है । सरकार अल्पमत में है और दो घटक दलों की बैसाखी पर टिकी है । 

 चुनाव के बाद नयी गठबन्धन सरकार बन गयी है पर यह शीशे की तरह साफ है कि मौजूदा चुनाव व्यवस्था किसी भी चोर, बदमाश, गुंडे, बलात्कारी को चुनाव लड़ने और जीतने का मौक़ा आसानी से दे देती है । पिछले 75 सालों में इसने राजनीतिक पार्टियों को इतना बेशर्म और ढीठ बना दिया है कि वे जनता को बेवकूफ बनाने के लिए किसी भी हद तक चली जाती हैं । वे चुनाव में जाति, धर्म, धन और बल का इस्तेमाल करती ही हैं, गुंडों और बलात्कारियों को, महिलाओं के खिलाफ लगातार अनर्गल प्रलाप करने वालों को भी खुलेआम टिकट दे देती हैं । 

गरीब महिलाएँ समझ रही हैं कि 100 रुपये का 5 किलो अनाज देकर उन्हें भिखारी बना दिया गया है जबकि बदले में महँगाई से उनकी कमर तोड़ दी गयी है तथा रोजगार और सामाजिक सुरक्षा देने की नैतिक जिम्मेवारी से सरकार ने बड़ी चालाकी से पल्ला झाड़ लिया है । दूर हँसदिहा और तमाम जंगलों की आदिवासी महिलाएँ न जाने कब से अपने जल–जंगल–जमीन को बचाने का आन्दोलन कर रही हैं । सड़क बनाने के नाम पर उत्तराखण्ड और हिमाचल में लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं और घर उजाड़े जा रहे हैं, उनका भी बुरा असर औरतों पर ही पड़ता है । 

भारत में 15–49 आयु की 57.2 प्रतिशत महिलाएँ खून की कमी (एनीमिया) की शिकार हैं, जो 2015–16 में 53.2 प्रतिशत की तुलना में अधिक है । अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार अभी भारत में सिर्फ 7.5 फीसदी महिलाएँ किसी तरह का रोजगार करती हैं । एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक, तमाम कानूनों के बावजूद भारत में 10 में से हर 3 महिला घरेलू हिंसा की शिकार होती है । घरेलू हिंसा के कई प्रकार हैं, इसमें शारीरिक हिंसा, भावनात्मक हिंसा, आर्थिक हिंसा, यौन हिंसा, ये सब आते हैं । 2019 में भारत में प्रति दिन बलात्कार के 87 केस दर्ज हुए । 

डीडब्लू (ऑनलाइन) में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनावों में जीतने वाले प्रत्याशियों में से 46 प्रतिशत ऐसे हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं । लोकतंत्र में सुधार के मुद्दों पर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने अपने अध्ययन में बताया है कि 543 जीतने वाले प्रत्याशियों में से 46 प्रतिशत (251) प्रत्याशियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं । इसके अलावा सभी जीतने वाले प्रत्याशियों में 31 प्रतिशत (170) ऐसे हैं जिनके खिलाफ बलात्कार, हत्या, अपहरण जैसे गम्भीर आपराधिक मामले दर्ज हैं । 

उसी रिपोर्ट में बताया गया है कि 27 जीतने वाले प्रत्याशी ऐसे हैं जो दोषी भी पाए जा चुके हैं और या तो जेल में बन्द हैं या जमानत पर बाहर हैं । चार जीतने वाले प्रत्याशियों के खिलाफ हत्या के मामले, 27 के खिलाफ हत्या की कोशिश के मामले, दो के खिलाफ बलात्कार, 15 के खिलाफ महिलाओं के खिलाफ अन्य अपराध, चार के खिलाफ अपहरण और 43 के खिलाफ नफरती भाषण देने के मामले दर्ज हैं । 

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि किसी साफ पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी की जीतने की सम्भावना सिर्फ 4.4 प्रतिशत है, जबकि आपराधिक मामलों का सामना कर रहे प्रत्याशी की जीतने की सम्भावना 15.3 प्रतिशत है । 

रिपोर्ट आगे अत्यन्त विचलित करने वाले आँकड़े देती है । 

 बीजेपी के 240 विजयी प्रत्याशियों में से 39 प्रतिशत (94), कांग्रेस के 99 विजयी प्रत्याशियों में से 49 प्रतिशत (49), सपा के 37 में से 57 प्रतिशत (21), तृणमूल कांग्रेस के 29 में से 45 प्रतिशत (13), डीएमके के 22 में से 59 प्रतिशत (13), टीडीपी के 16 में से 50 प्रतिशत (आठ) और शिवसेना (शिंदे) के सात में से 71 प्रतिशत (पाँच) प्रत्याशियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं ।  

आखिर भारत में चुनाव–दर–चुनाव ऐसे सांसदों की संख्या बढ़ती क्यों जा रही है ? क्या हम महिलाएँं इस संसद से अपने लिए कोई उम्मीद कर सकती हैं ? अगर यहाँ 33 प्रतिशत महिलाएँ भी चुन कर आ जाती हैं तो चंद दिखावटी सुधारों के अलावा यहाँ हमें भला क्या मिल सकता है ? इस व्यवस्था में जन भागीदारी वाले लोकतंत्र की तो कोई जगह है ही नहीं। साम्प्रदायिक फासीवादी राजनीति की अपराजेयता को चुनौती देने के लिए लोकतंत्र के चुनावी समर में भाग लेना तो ठीक था परन्तु पितृसत्ता से पूर्ण मुक्त तथा न्याय और बराबरी पर टिके समाज के निर्माण के लिए हमें इस दायरे से बाहर जाकर सोचना होगा । इस लक्ष्य को अपने जन संगठनों और जन आन्दोलनों के जरिये ही हासिल किया जा सकता है ।