मलाला, गजाला और बबली

रोज़ ही तो मरती हैं बबलियाँ- “रिपोर्टेड” या “अनरिपोर्टेड." गजाला जावेद
को महज़ इसलिए मार दी गयी कि वह गाती थी. मलाला को इसलिये गोली मार दी गयी कि वह
पढ़ना चाहती थी. बबली इसलिए इनवर्टर से जल गई क्योंकि वह सुकून से जीना चाहती थी.
जो वहशीपन और बलात्कार का शिकार
हो रहीं हैं, वे भी तो हर दिन, हर पल जीते-जी मर ही रहीं हैं. उन सबका दोष क्या
है? किसने हक दिया कि कोई जीते-जी उनकी जिन्दगी को नरक बना दे, उन्हें इतनी बेरहमी
से और इतनी आसानी से मार दे? बबलियों का शादी-ब्याह कोई और तय करता है... उनका
जीना-मरना कोई और तय करता है. फरमान जारी होता है कि लडकियाँ पढाई न करें, उनकी शादी काम उम्र में ही कर दी
जाय. कहीं खाप है तो कहीं तालिबान. लड़कियों के पहनावे या उन्मुक्त जीवन-शैली या
उनका घर से बाहर निकाल कर पढाई और नौकरी करने को ही उनके साथ छेड़-छाड़ और बलात्कार
का कारण बताया जाता है. किसी राजनीतिक दल को किसी बबली त्रासदी की से भला क्या
लेना-देना.
बबली को सिर्फ “बबली” मान जाता है. समाज इन्हें
जीता-जागता इन्सान मानना शुरू कर दे, तो कोई मलाला गोली का शिकार नहीं होगी, कोई
बबली इन्वर्टर से नहीं जलेगी, फिर कोई वहशी इंसानियत को शर्मसार नही कर
पायेगा...लेकिन यह सब इतना आसान तो नहीं.
सच तो यह है कि ये घटनाएँ एक
दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं. तीनों के पीछे एक ही जैसे कारण रहे हैं.
मलाला पर गोली क्यों चलाई गई?
भला पढ़ाई इतनी खतरनाक बात कब से हो गयी कि पढने और पढ़ाने का सपना देखने वाली इस
नन्हीं सी बच्ची के खिलाफ तालिबानों ने अपनी बहादुरी का परिचय दिया? वास्तव में यह
गोली उस विचार से निकाली थी जो औरतों को दबा कर रखने का हामी है. यह सोच उसी
मर्दवादी, पितृसत्तात्मक सामाजिक और धार्मिक विचार का हिस्सा है जो औरतों को पढ़ने
नहीं देती थी. एक वह भी दौर था जब पढने पर उनके कान में पिघला सीसा डाल दिया जाता.
इसलिए कि औरत पढ़ लेगी और ज्ञान हासिल कर लेगी तो गाय की तरह खूंटे से बंधने के लिए
तैयार नहीं होगी, चुपचाप एक पिंजरे से दूसरे पिंजरे में नहीं जाएगी. वह सोचेगी
अपने बारे में, अपने भले-बुरे और अपनी जिन्दगी से जुड़े फैसलों के बारे में. वह घर
की दहलीज लाँघ कर सामाज में अपना योगदान देना चाहेगी. वह हर तरह की बराबरी का
अधिकार मांगने लगेगी. इसलिए उसे पढ़ाया नहीं जाता था और आज भी कट्टरपंथी उसे गुलाम
बनाये रखने के लिए यह जरूरी समझते हैं कि उसे पढने न दिया जाय- चाहे अफगानिस्तान
हो, पाकिस्तान हो या भारत, सभी दकियानूस और मर्दवादी कट्टरपंथी यही चाहते हैं.
गजाला पश्तो भाषा की एक लोक
गायिका थी. उसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी. धार्मिक कट्टरपंथियों को यह
बर्दाश्त नहीं हुआ. वे चाहते हैं की औरत पुरुषों के इशारों पर कठपुतली की तरह
नाचे, लेकिन अपनी कला और प्रतिभा का प्रदर्शन न करे. औरतों की आजादी उन्हें बर्दाश्त नहीं.
वे धर्म और परंपरा की आड़ में
पितृसत्ता की बर्बरता को कायम रखना चाहते हैं और जब भी कोई लड़की या औरत इस सोच से
आगे जाकर निजी पसंद, ख्वाहिशों, इच्छाओं और आजादी के बारे में सोचती है, तब उसे
इतनी बुरी तरह डराने का प्रयास किया जाता है ऐसी कठोर सजा देने की कोशिश की जाती
है कि कोई दूसरी लड़की अपनी आजादी के बारे
में सोचना बंद कर दें. और लड़कियाँ हैं कि हर कीमत पर अपनी आजादी बरक़रार रखना चाहती
है- जान देकर भी.
जहाँ तक बबली की बात है, उसे तो
हम हर घर में महसूस कर सकते हैं. हमारे समाज में मर्दवादी सोच के चलते लोग लड़की को
“बबली” ही बनाए रखना चाहते हैं. जिस
तरह लड़कियों को पाला जाता है, जिस तरह पुरुष-प्रधान विचारों की घुट्टी पिलाई जाती
है, उसके बाद अधिकांश लड़कियाँ यह मान लेती हैं की शादी के बाद पिता के घर पर उनका
किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं रह जाता. इसलिए रोज़-रोज़ पिट कर भी वे मायके वालों के सामने मुस्कुराती रहती हैं. वे
जताती ही नहीं कि उन्हें कोई तकलीफ है. ये विचार उनके खून में इतनी घुलीमिली रहते
हैं कि वे खुद ही जल जाती हैं, मर जाती हैं, फिर भी मायके वालों को अपनी तकलीफ
नहीं बतातीं. यह एक बबली का सवाल नहीं है, रोज़ ही हमारे आसपास कोई बबली मरती रहती
है, मर्दवादी सोच की बलि चढ़ती रहती है. दस साल तक किसी के साथ वैवाहिक जीवन जीने
के बाद भी इसकी गारंटी नहीं होती की लड़की खुश है, सुरक्षित है. यह कैसी शादी होती
है? यह कैसा समाज है? यह कैसी परम्पराएं हैं और यह कैसा भय है जो लड़की के
दिलो-दिमाग में घर किये रहती है?
इसमें कोई संदेह नहीं कि आज
असंख्य मलालाओं, गजालाओं और बबलियों के साथ जो कायराना और वहशी सलूक किये जा रहे
हैं, उनके पीछे आज की औरत का आजादी से गहरा लगाव और उसे हर कीमत पर हासिल करने का
जज्बा है. ये घटनाएँ इस बात का ऐलान हैं कि जोर-जुल्म, दहशत और तानाशाही के दम पर
अब हमें कोई घर की चारदीवारी में कैद करके नहीं रख सकता. जागरूक महिलाओं के आगे यह
चुनौती है कि व्यक्तिगत रूप से की जाने वाली इन बगावतों और अलग-अलग दिशाओं से उठ
रही आवाजों को एक पुरजोर आँधी और मुकम्मिल बदलाव की और कैसे ले जायें.
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